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गीता- नंद भवन

​
​4 वर्ष के मोहित को लेकर बिहार से आना,
भूली नहीं, खाली ज़मीन पर घर बनवाना।
वह घर ईंट, पत्थरों, दीवारों का ही नहीं,
घर के हर कोने की कहानी है कही, अनकही।
घर की चौखट पर जब नज़रें जाती हैं,
हर तस्वीर आँखों में उतर आती है।
वह बड़ी-सी छत, खुला आसमान,
समेटे था वह घर, सभी के अरमान।
कुछ यादों के पन्ने ज़ेहन में घूम रहे आज भी,
वो गली-मुहल्ला, गंगाराम का दूध-याद है आज भी।

​घर में दो बुजुर्ग थे, साया था, छत्र थी,
मैं उस घर में एक बड़ी बहू थी।
उस बड़े घर की सफ़ाई से थे हम त्रस्त,
क्योंकि हमारी बाई थी बहुत सफ़ाई-परस्त।
बाई की निगाहें चारों तरफ़ घूमती रहती थीं,
झाड़ू-पोंछा होने पर भी कचरा ढूँढ ही लेती थीं।
बापूजी का अनोखा अंदाज, रोबीली फ़ितरत थी,
गुस्सा आने पर घर छोड़ देने की धमकी-एक आदत थी।
यादों का कोई अंत नहीं, यादों को छोड़ूँ कैसे!
उस एहसासों के खजाने को बिसराऊँ कैसे!

​हाँ, वह 'गीता-नंद भवन' हुआ अब पराया,
अमुक परिवार ने अमुक नाम से है अपनाया।
               10 अक्टूबर 2026।

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