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एक अनुभव

                                                        मेरे घर एक परिचिता आई -काफी अस्वस्थ थी | कुछ दिन पूर्व उन्होंने एक नामी अस्पताल में घुटनों का ऑपरेशन कराया था | अब पुनः चेक अप के लिए वे उस अस्पताल जाना चाहती थी | मदद के तौर पर उन्होंने मुझे साथ चलने का अनुरोध किया | हम दोनों अस्पताल पहुंचे | ऑपरेशन डॉक्टर अवस्थी ने किया था | हमने रिसेप्शन पर बैठी महिला से पता कर लिया कि डॉक्टर अवस्थी  अस्पताल में आये हैं और थोड़ी देर में अपने केबिन में पहुँच जायेंगे | ५०० रुपये भर कर परचा बनवा लिया | हमारी तरह काफी मरीज डॉक्टर अवस्थी को दिखाने कतार में बैठे थे |
                                                        2 घंटे की प्रतिक्षा के बाद भी डॉक्टर अवस्थी अपने केबिन में नहीं आये | कुछ मरीज बैचेन होने लगे -रिसेप्शन पर शोर मचाने लगे | शोर सुनकर डॉक्टर अवस्थी के केबिन में बैठे उनके सहयोगी जूनियर डॉक्टर शर्मा बाहर आ गए , बोले - 'आप परेशान मत होइए , डॉक्टर साहब को आने में अभी देर है , जब तक में आप लोगों को देख लेता हूँ |' इंतज़ार  में बैठे एक मरीज के साथ आए एक सज्जन बड़े उद्वेलित हो गए ,झल्लाते हुए बोले -'हमने डॉक्टर अवस्थी के नाम का पर्चा बनवाया और रुपये भरे हैं | यदि वे नहीं मिल सकते थे तो हम परचा नहीं बनवाते | वर्ना जूनियर डॉक्टर की फीस तो 300 रुपये ही है |'
                                                       स्वाभाविक है - थोड़ी ही देर मै डॉक्टर अवास्थी हाजिर......|

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4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

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लेखनी - एक अनजान की

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मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ