Skip to main content

अभिवादन - एक भारतीय परम्परा

                                              आज भागती जिन्दगी अर्थात् FAST LIFE में 'हाय ' 'हैलो 'कहने  की प्रथा  है ' नमस्ते' अब कौन कहता है , करता है ! गर्दन को थोडा झुकाकर हाथों को जोड़कर नमस्ते करना - एक पुरानी सी बात हो गई है | अभिवादन का तात्पर्य है- GREETING . यदि हम 'हैलो'  कह कर भी किसी का अभिवादन करते हैं  तो सामने वाले इंसान को उसकी अहमियत का अहसास होता है |                                                                                                                  हम राह चलते हर व्यक्ति को तो नमस्ते करते नहीं या हैलो कहते नहीं ! आपने गौर किया होगा-यदि हम किसी से नाराज़ होते हैं तो उस से नज़रें चुराकर पास से निकल जाते हैं | अभिवादन वो दरवाजा है जिसे बंद कर के हम इस गुमान में आ जाते हैं कि हम ने उस व्यक्ति के वजूद को नकार दिया- सच माना जाय तो हमनें स्वयं को धोखा दिया है |
                                                 यदि हम किसी परिचित को देख कर नहीं मुस्कराए तो उसकी झोली में ख़ुशियाँ कम नहीं हुई बल्कि एक फूल हमारे पास ही रह गया जो कि वीरान में पड़ा कभी कुम्हला जायेगा | किसी डाली पर खिलना , मुस्कराना , इठलाना और अंततः कुम्हलाना , मुरझाना हर फूल की नियति है | यदि यही फूल किसी के मुस्कान का कारण बन जाय तो इसका खिलना ही सार्थक बन जाता है | मुस्कराहट  एक व्यापक भाषा है | एक हाथ को हवा में हिला कर 'हाय ' कहो - या सामने वाले के हाथ में हाथ थाम कर 'हैलो' कहो - हर तरह का अभिवादन मुस्कान भरा हो -यही हमारी भारतीय परम्परा है |

Comments

Popular posts from this blog

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ