वर्षा थमे बीते दिन चार ,
भीगी -भीगी सी है दिवार |
टंगी हुई अम्मा-बाबा की तस्वीर ,
सील गई ,हुए कागज़ तार-तार |
दिखाया एक खेल कुदरत ने,
पिछवाड़े के मैदान में |
खरपतवार ने फैलाया जाल,
निर्जन भू ने ओढ़ी हरी शॉल |
वृक्षों के हर पात खिले ,
छोटे-छोटे पौध खड़े नीम तले |
मानो पोते मुरख रहे दादा का मुख ,
देख , पाया एक अनुपम सुख |
गीली है बाहर की दिवार,
आ गई इसमें एक दरार |
लो , झांक रही पीपल की टहनी ,
बता रही जिन्दगी की कहानी |
प्यासी धरती भी हुई तृप्त ,
कृषक भी हुए मदमस्त |
दिखे निसर्ग कितना हरितम ,
अन्न पैदा होगा अधिकतम |
कुदरत भी दे रही एक पैगाम ,
नहीं है कहीं , कोई लगाम |
सभी को होगी दाल मयस्सर ,
है यह स्वस्थ भारत के आसार |
भीगी -भीगी सी है दिवार |
टंगी हुई अम्मा-बाबा की तस्वीर ,
सील गई ,हुए कागज़ तार-तार |
दिखाया एक खेल कुदरत ने,
पिछवाड़े के मैदान में |
खरपतवार ने फैलाया जाल,
निर्जन भू ने ओढ़ी हरी शॉल |
वृक्षों के हर पात खिले ,
छोटे-छोटे पौध खड़े नीम तले |
मानो पोते मुरख रहे दादा का मुख ,
देख , पाया एक अनुपम सुख |
गीली है बाहर की दिवार,
आ गई इसमें एक दरार |
लो , झांक रही पीपल की टहनी ,
बता रही जिन्दगी की कहानी |
प्यासी धरती भी हुई तृप्त ,
कृषक भी हुए मदमस्त |
दिखे निसर्ग कितना हरितम ,
अन्न पैदा होगा अधिकतम |
कुदरत भी दे रही एक पैगाम ,
नहीं है कहीं , कोई लगाम |
सभी को होगी दाल मयस्सर ,
है यह स्वस्थ भारत के आसार |
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