बचपन से ही घर में सुनती और देखती आई हूँ- चूल्हा जले तो पहली रोटी गाय की हो | दादी कहती थी -'गाय में सभी देवताओं का वास होता है |' आज भी दादी के दिए संस्कार हमारी आदत में निहित है | गाय को देवता के रूप में मानना -सभी इस बात के पक्षधर नहीं हैं | हाँ , गोहत्या न हो -यह तो सभी मानते हैं |
पिछले दिनों दादरी में कुछ शरारती तत्वों ने मोहम्मद अख़लाक़ के घर में गोमांस की अफवाह फैलाई और इस शक में उसे पीट-पीट कर मार डाला | हिन्दू- मुसलमान या जातीय- विवाद के लिए ' गाय ' को मोहरा बनाया जा रहा है | राजनैतिक दांवपेंच खेले जा रहे हैं | यह एक संवेदनशील विषय है |
जयपुर की गोशाला में गायों की दुर्दशा जानकर बहुत दुःख हुआ | चार वर्षों में सत्ताईस हजार गायों ने दम तोड़ दिया और अब भी अनगिनत गायें अंतिम साँसे ले रही हैं | नगर निगम की ओर से संचालित यह गोशाला भारतीयता के लिए कलंक बन गई है | कीचड़ और दलदल में फँसी गायों को सँभालने वाला कोई नहीं | हम पशुप्रेम बहुत जाहिर करते हैं |' गोरक्षक ', ' गोभक्त ', ' गोसेवक ' शब्द सुनाने बहुत अच्छे लगते हैं | इन्हीं की मांग -' गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाय '- मात्र एक आडम्बर है |
भारतीय परिवार गोदान करना एक पुण्य कर्म मानता है | सच माना जाय तो 10 गायों का दान करना - पुण्य कर्म नहीं है , बल्कि एक अस्वस्थ गाय को स्वस्थ कर देना -ही पुण्य है | यदि गोदान करके पापों का प्रायश्चित हो जाता है , तब सोचना होगा कि गायों को मरने के लिए स्थिति पैदा करने वाला संचालक चाहे वह सरकार हो या सरकारी अधिकारी हो या ऐसा होता हुआ देखने वाला समाज हो - क्या पाप का भागीदार नहीं होगा ? इस तरह तड़पकर मरती गऊ माता भी सोचती होगी की बूचड़खाने से मिलने वाली मौत इससे ज्यादा बेहतर है |
आज पूरे समाज और देश की यह जिम्मेदारी है कि गायों को जीवनदान देने में हर संभव अपनी क्षमतानुसार मदद करे |
पिछले दिनों दादरी में कुछ शरारती तत्वों ने मोहम्मद अख़लाक़ के घर में गोमांस की अफवाह फैलाई और इस शक में उसे पीट-पीट कर मार डाला | हिन्दू- मुसलमान या जातीय- विवाद के लिए ' गाय ' को मोहरा बनाया जा रहा है | राजनैतिक दांवपेंच खेले जा रहे हैं | यह एक संवेदनशील विषय है |
जयपुर की गोशाला में गायों की दुर्दशा जानकर बहुत दुःख हुआ | चार वर्षों में सत्ताईस हजार गायों ने दम तोड़ दिया और अब भी अनगिनत गायें अंतिम साँसे ले रही हैं | नगर निगम की ओर से संचालित यह गोशाला भारतीयता के लिए कलंक बन गई है | कीचड़ और दलदल में फँसी गायों को सँभालने वाला कोई नहीं | हम पशुप्रेम बहुत जाहिर करते हैं |' गोरक्षक ', ' गोभक्त ', ' गोसेवक ' शब्द सुनाने बहुत अच्छे लगते हैं | इन्हीं की मांग -' गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाय '- मात्र एक आडम्बर है |
भारतीय परिवार गोदान करना एक पुण्य कर्म मानता है | सच माना जाय तो 10 गायों का दान करना - पुण्य कर्म नहीं है , बल्कि एक अस्वस्थ गाय को स्वस्थ कर देना -ही पुण्य है | यदि गोदान करके पापों का प्रायश्चित हो जाता है , तब सोचना होगा कि गायों को मरने के लिए स्थिति पैदा करने वाला संचालक चाहे वह सरकार हो या सरकारी अधिकारी हो या ऐसा होता हुआ देखने वाला समाज हो - क्या पाप का भागीदार नहीं होगा ? इस तरह तड़पकर मरती गऊ माता भी सोचती होगी की बूचड़खाने से मिलने वाली मौत इससे ज्यादा बेहतर है |
आज पूरे समाज और देश की यह जिम्मेदारी है कि गायों को जीवनदान देने में हर संभव अपनी क्षमतानुसार मदद करे |
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