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पूत कपूत से तो बाँझ भली !

                                          कुछ दिन पूर्व एक वृद्धाश्रम के सामने से गुजरना हुआ | द्वार के पास काफी भीड़ दिखी - अनायास पैर अन्दर की और खींचे चले गए | इस से पूर्व आश्रम में दो बार चुकी हूँ | पर हमेशा तरह की नीरवता और शांति ही मिली | आज भीड़ को देख कर उत्सुकता हुई | पूछने पर पता चला - ' कौशल्या जी का देहांत हो गया | ' काफी वर्ष पूर्व कौशल्या जी के बेटे उन्हें इस आश्रम में छोड़ गए थे | इनके दो बेटे और एक बेटी हैं |
                                           मैंने एक परिचित स्थानीय कर्मचारी से पूछा - " इनके बच्चे कब आएंगे ? "
उन्होंने कहा - " जी कहाँ ? उनका कोई अता पता ही नहीं | जब तक पिता की पेंशन बच्चों को मिलती थी , तब तक हर माह कोई ना कोई बच्चा आता था , पर जब से हमने पेंशन कौशल्या जी को दिलानी आरम्भ की , तब से उनमें से कोई आया ही नहीं | उन्होंने जो पता लिखाया - वहाँ कोई नहीं है | फ़ोन नंबर सही नहीं है बच्चों से संपर्क करें तो कैसे ? मेरी निगाहें कई प्रश्नों का उत्तर जानना चाह रही थी | वे सज्जन ही बोले - " जी हम ही इनका परिवार हैं | हम ही इन्हें मुक्तिधाम ले जायेंगे | "
                                             इस घटना से मन बहुत बैचेन हुआ , अन्दर एक तूफ़ान उठ गया | आज भी भारतीय समाज में हर दम्पत्ति औलाद पाने के लिए कितने ही व्रत , तीर्थ , मन्नतों , में बंधे रह जाते हैं | औलाद होने पर थाल बजते हैं ,जश्न मनाया जाता है | अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने , उनके प्रति दायित्वों को पूरा करने में माता - पिता अपनी जिन्दगी बिता देते हैं | पर ये बच्चे उन के प्रति अपना दायित्व भूल कर पलायन कर जाते हैं | माता - पिता बच्चे की जिम्मेदारी है | आत्मनिर्भर होने पर बच्चों का माता - पिता से अलग हो जाना या उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ देना - निंदनीय है | समाज और सरकार को चाहिए कि ऐसा कानून बनाए - जिससे बच्चे अभिभावकों के प्रति दायित्व निभाए और उनकी देखरेख करें | जो बच्चे माता - पिता को तिरस्कृत कर अपनी अलग दुनिया बसा लेते हैं , उन्हें भी समाज तिरस्कृत करे - बहिष्कृत करे |
                                             इस तरह मानसिक वेदना से संतप्त कौशल्या जी जैसी बहनें सोचने को विवश होती होंगी कि - ' पूत कपूत से तो बाँझ भली ! '

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