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परवरिश

                                                  हरिप्रसाद बहुत खुश हैं | बिटिया आरती की सगाई रामस्वरूप के बेटे राजीव के साथ हो गई | उनके दोस्त रामस्वरुप ने अपना वचन निभाया | कुछ ही वर्ष पूर्व ही रामस्वरूप ने कह दिया था  ' आरती को तो मेरे घर ही ले जाऊँगा |'
                                                  आरती 5 वर्ष की थी , जब पत्नी का देहांत हो गया | आस पास ऐसा कोई रिश्तेदार नहीं था , जिस पर विश्वास करके हरिप्रसाद आरती को उन्हें सौंप पाते , लिहाजा परवरिश की पूरी जिम्मेदारी अपने ही हाथों में रखी | वे ही माँ थे और वे ही पिता भी | उनका हर दिन बिटिया को चुम्बन दे कर उठाने से शुरू होता और रात उसे थपथपाकर सुलाने से बीतता | सच मानो तो वे आरती के लिए ही जी रहे थे | घर के अन्दर आरती और घर के बाहर नौकरी - दोनों के बीच सामंजस्य बिठाए रखते थे |
                                                 आरती को याद है - जब पापा दोनों हाथों से उसे कसकर पकड़कर चकरी की तरह घूमते थे , तो वह खिलखिला उठती थी , भरोसा था कि पापा उसे कभी नुकसान नहीं पहुँचने देंगे | उस अनकहे भरोसे के प्रति हरिप्रसाद के चेहरे पर आनंद ही झलकता था | इस आनंद के लिए वे हर तकलीफ को हंस कर झेल जाते थे | समय के साथ आरती में भी आगे बढ़ने का जज्बा जग ही गया | उमंगों और तरंगों को दुगना करते हुए पूरी ऊर्जा के साथ अपने लक्ष्य में लगी रहती और अपने पापा के कामों में सहयोग देती |
                                                   सगाई होने के बाद से हरिप्रसाद के चेहरे पर ख़ुशी है , परन्तु अन्दर ही अन्दर वे एकाकीपन के आभास मात्र से चिंतित हैं | फिर सोच लेते - राजीव इसी शहर में नौकरी करता है , तो शादी के बाद भी आरती से मुलाकात होती ही रहेगी ! रामस्वरूप अपनी पत्नी के साथ इलाहाबाद में पैतृक निवास में रहने लगे हैं | इधर आरती तो नए जीवन के इस पहल के बाद से ही मायूस है | पापा को अकेले छोड़ने को वह कतई तैयार नहीं | विवाह के बाद .......क्या होगा , इन्हीं ख्यालों में वह परेशान थी | अचानक घर की घंटी बजी | हरिप्रसाद ने घड़ी की ओर देखा - रात के 8 बज रहे हैं | उन्होंने दरवाजा खोला | सामने राजीव को देखकर दोनों स्तब्ध रह गए | आरती भीतर कमरे में चली गई | कुछ देर बाद राजीव ने चुप्पी तोड़ी -" मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ | " हरिप्रसाद कुछ आशंकित भय से  घबरा गए , धीरे से बोले - " कहो , क्या कहना चाहते हो ? " 
" जी मेरी इच्छा है शादी के बाद हम दोनों आप के साथ ही रहें | "
"पर क्यों लोग क्या कहेंगे ? समाज में तुम घर जवाई के नाम से जाने जाओगे | इससे रामस्वरूप का भी अपमान होगा - यह मैं सहन नहीं कर सकूँगा | "
" पापा घर जवाई नहीं , बेटा कहिए | कौन क्या कहता है या क्या सोचता है - हम उस की परवाह क्यों करें ? आपने आरती को पाला , बड़ा किया | अब आप अकेले रहें , यह उचित नहीं | हम भी आपकी छाया में रहेंगे  , खुश रहेंगे | " 
राजीव के मीठे बोल हरिप्रसाद को मुग्ध कर गए | इतना कह कर राजीव तो चला गया , पर हरिप्रसाद के भीतर तूफान उठ गया | कुछ सोचते हुए उन्होंने रामस्वरूप को फ़ोन लगाया | फ़ोन उठाते ही रामस्वरूप बोले - " कहो हरिप्रसाद , मुझे पता था तुम्हारा फ़ोन आएगा | भई तुम राजीव के अचानक आने से परेशान हो गए या राजीव  के विचारों से ? तुम परेशान मत होओ , विवाह के बाद बच्चों का तुम्हारे साथ रहना - यह राजीव  का अपना निर्णय है | इसमे हमें कोई आपत्ति नहीं | "
                                                      हरिप्रसाद समझ गया - राजीव  की सोच और संस्कार रामस्वरूप की परवरिश का ही परिणाम है | 

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