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बरस रही है ज्वाला भारी

बरस रही है ज्वाला भारी ,
तप रही है धरती सारी |
उगल रहा है रवि - अनल ,
चाँद भी नहीं रहा शीतल |

स्वेद बहाती यह चिपचिपाती धूप ,
अलसाए से ये दिन बेरंग - बेरूप |
असहनीय और तड़पाती ये पछवा  ,
धूल  धूसरित लू और ये शुष्क हवा |

शत-शत नमन है हलधर को ,
सह जाते धूप के इस कहर को |
फटी बिवाई , तथापि हल चला रहे ,
ठन्डे - रसीले कंदमूल हमें खिला रहे |

वन्दनीय हैं हमारी सेना के जवान ,
गर्मी हो या सर्दी ,चाहे हो गोलियों की बौछार |
प्रहरी बन , सीमा पर हर पल वे जगते हैं ,
ताकि हम बेखौंफ़ चैन से सो सकते हैं |

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आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ