बरस रही है ज्वाला भारी ,
तप रही है धरती सारी |
उगल रहा है रवि - अनल ,
चाँद भी नहीं रहा शीतल |
स्वेद बहाती यह चिपचिपाती धूप ,
अलसाए से ये दिन बेरंग - बेरूप |
असहनीय और तड़पाती ये पछवा ,
धूल धूसरित लू और ये शुष्क हवा |
शत-शत नमन है हलधर को ,
सह जाते धूप के इस कहर को |
फटी बिवाई , तथापि हल चला रहे ,
ठन्डे - रसीले कंदमूल हमें खिला रहे |
वन्दनीय हैं हमारी सेना के जवान ,
गर्मी हो या सर्दी ,चाहे हो गोलियों की बौछार |
प्रहरी बन , सीमा पर हर पल वे जगते हैं ,
ताकि हम बेखौंफ़ चैन से सो सकते हैं |
तप रही है धरती सारी |
उगल रहा है रवि - अनल ,
चाँद भी नहीं रहा शीतल |
स्वेद बहाती यह चिपचिपाती धूप ,
अलसाए से ये दिन बेरंग - बेरूप |
असहनीय और तड़पाती ये पछवा ,
धूल धूसरित लू और ये शुष्क हवा |
शत-शत नमन है हलधर को ,
सह जाते धूप के इस कहर को |
फटी बिवाई , तथापि हल चला रहे ,
ठन्डे - रसीले कंदमूल हमें खिला रहे |
वन्दनीय हैं हमारी सेना के जवान ,
गर्मी हो या सर्दी ,चाहे हो गोलियों की बौछार |
प्रहरी बन , सीमा पर हर पल वे जगते हैं ,
ताकि हम बेखौंफ़ चैन से सो सकते हैं |
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