Skip to main content

बहती गंगा

                           अचानक निरीक्षण के लिए सरकारी अधिकारी पहुँच गए | स्टोर कीपर को पुकारते हुए स्टोर में प्रवेश किया | रजिस्टर को हाथ में लेकर सभी सामनों की जाँच - पड़ताल हुई | स्टोर के बाहर दरवाजे के पास एक बड़ा तख़्त पड़ा हुआ था | उसकी एंट्री रजिस्टर में थी |
अधिकारी ने पूछा - " इसे स्टोर के बाहर क्यों रखा है ? "
स्टोरकीपर - " सर , यह तख़्त बहुत बड़ा है , स्टोर के अन्दर नहीं जा पा रहा है , इसलिए बाहर रखा है | "
अधिकारी - " तुम सही कह रहे हो , यह जरुरत से ज्यादा बड़ा है | तुम्हें अड़चन ही दे रहा है | ऐसा करो - यह मेरी कोठी भिजवा दो , वहां से छोटा तख्ता ले आना |
कुछ ही देर में रजिस्टर में लिखे ' तख़्त ' में 'आ ' की मात्रा लगा दी गयी और ' तख्ता ' लिखा गया |
                             दो दिन की छुट्टी बिताने के बाद बड़े बाबू दफ्तर पहुंचे | स्टोर के दरवाजे के पास रखा तख़्त कुछ छोटा लगा | स्टोरकीपर से जानकारी ली | पूरा किस्सा ही जान गए | बड़े बाबू सोचने लगे - " लोग बहती गंगा में डुबकी लगा लेते हैं | मैंने तो पूरी जिंदगी यहाँ लगा दी | यदि मैं बहती गंगा में हाथ धो लूँ तो क्या हर्ज है ? "
                             बस , बड़े बाबू ने रजिस्टर हाथ में लिया , कलम उठाई , 'तख्ता ' में ' ई ' की मात्रा  लगा ' तख्ती ' लिख दिया | उन्होंने अपने घर से  ला कर एक तख्ती स्टोर के दरवाजे पर लटका दी  और वह तख्ता  उनके घर शोभायमान हो गया |
               

Comments

Popular posts from this blog

अपनों के खोने का भय

                                                   आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे  एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |                                                    मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...

गर्मी ! गर्मी ! गर्मी !

         ये भीषण गर्मी ,          दिनोंदिन बढ़ती तपन ,          आग बरसाती ये सूरज की किरणें ,           पसीने से सराबोर इंसान ,           हर पल घूरता नभ को ,           कब बरसेगा पानी |

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...