Skip to main content

छुट्टियों में ....

छुट्टियों में बच्चों का घर पर आना ,
है बड़ा सुखद जीवन बन नानी - नाना |
सिद्धांत ,सुहानी ,गौरांश  और रिवान ,
देख इन्हें आती लबों पे मीठी मुस्कान |

ह्रदय इनके हैं मासूम , कोमल सरीखे ,
दूर इनसे  द्वेष - दंभ के कांटे तीखे |
हर चीज जानने को मन बड़ा हठीला ,
उत्सुकता प्रबल, है मन बड़ा बावला |

आपके यहाँ इत्ती गर्मी क्यों ?
सुबह ये मोर शोर मचाते क्यों ?
नन्हीं चींटी दाना ले कर चढ़ती क्यों ?
दीवार पर सौ बार फिसलती क्यों ?

रोज -रोज नानू टॉफी दिलाते क्यों ?
तो नानी , आप नाराज होती क्यों ?
एक स्मार्ट फ़ोन हमारे पास हो तो ,
हमारी मम्मा को समझाओ तो |

रोना मचलना है अधिकार इनका ,
मोती से आंसू है हथियार इनका |
दृगों में कुतूहल है छलक रहा ,
मुख पर विजय - गर्व  झलक रहा |

प्यारा - सा खेल - खिलौना बचपन ,
भागती दुनिया में सुकून - सा बचपन |
ये रोम-रोम आल्हादित कर जाते ,
नाना-नानी को 'फुल रिचार्ज ' कर जाते |

Comments

Popular posts from this blog

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,       निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक       बजे थे छः उदित सुबह के ,       जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |       दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,       बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |       स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,       हुई यह छोटी सी गलती उससे      'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,      करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |      अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,      भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |      उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,      पर करा नीचे कुछ सोचकर |     चले गए वे यह बड़बड़ाकर -     'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|                                   मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,             ...