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दायरा

वो एक अल्हड़ कमसिन उम्र ही तो थी,
रोज एक नए सपने में मैं खो जाती ।
अपनी बाहें फैला घूमने लगती ,
आकाश को अपने घेरे के अंदर पाती ।

उमंगों से भर नाचने लगती जिंदगी ,
मर्यादा के फ्रेम में जकड़ी ये जिंदगी ।
दादी की टोका-टाकी, एक बवंडर मचाती ,
माँ बस सीमित दायरे को ही समझाती ।

आज भी मां के आशा -आशयों को ही मथ रही ,
उनके मार्फत अपने अस्तित्व को ही खोज रही ,
छटपटाती हूँ क्योंकि दायरा है सीमित ,
न कर सकी अपने वजूद को परिभाषित ।

माँ हूँ , संतानों को किया मैंने पूर्ण सिंचित ,
लेकिन पिता तुल्य कुछ भी देने से हूँ वंचित ।
कुल-गोत्र का नाम नहीं मैं दे सकी ,
साहस के साथ बैसाखियाँ न तोड़ सकी ।

क्यों रहना पड़ता है हमें दायरे के भीतर ,
उलझनें तो नहीं आती, सोच के दायरे के भीतर ।
रह जाती हैं लबों पर तबस्सुम आंखों में नीर ,
भीतर के स्त्रीत्व को नेपथ्य में किया स्वीकार।

यह समाज क्यों बनाता है दायरा ,
करनी होगी जद्दोजहद, न कोई आसरा ।
कब तक सहेंगे ये हाशिये की पीड़ा ?
ये पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियां ?





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