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सुलोचना जी

           
            कल की ही बात है। मैं बाजार से घर आ रही थी । मोहल्ले के बच्चों को सड़क पर क्रिकेट खेलते देखा । मेरी चाल धीमी हो गई, क्योंकि इन बच्चों के बीच सुलोचना जी भी थी । वे साड़ी के पल्ले को कसकर, पटलियों को ऊंचा कर कमर में खोंसे हुए एक खिलाड़ी की मुद्रा में खड़ी थी । बच्चों के बीच बेटिंग करती हुई एक नवयुवती थी । जब उसने मेरे पैर छुए, तो याद हो आया -यह तो सुलोचना जी की बहू है । कुछ महीने पूर्व ही बेटे अनिल की शादी हुई है । अनिल गुड़गांव नौकरी करता है । यहां सास -बहू रहती हैं । मैनें सुलोचना जी को नमस्कार किया , वे कहने लगी- "बहू बच्चों के साथ खेलना चाहती थी, तो मैं भी शामिल हो गई ।" कहने को तो सुलोचना जी का वाक्य साधारण ही था, पर इस वाक्य से वे बहुत कुछ कह गए थी । बहू के प्रति उनके उदारवादी विचारों के सामने मैं नतमस्तक हो गई।
            मैं सुलोचना जी को कई वर्षों से जानती हूँ । अल्पायु में ही इनके पति का देहांत हो गया । निजी मकान और बेटे की पढ़ाई के कारण ये जयपुर में ही बस गई । जिंदगी भर हाथ थामने वाले का दुनिया से चले जाना- हमेशा के लिए एक अधूरापन देने वाला हादसा ही होता है । ऐसे दौर में जीवन के कदम बढ़ाना आसां नहीं होता । सुलोचना जी हमेशा मस्तमौला और हँसमुख रही हैं । सामूहिक उत्सवों में सजना, त्यौहारों की जोर शोर से तैयारी करना , पूजा में शामिल होना-इन्हें बहुत पसंद है । वे पीड़ा के दौर में भी अपने जीवन को संतुलित और खुशहाल बनाए रखने की कोशिश करती। गणगौर , तीज की पूजा में भी महिलाओं के बीच बैठ ही जाती हैं। स्वाभाविक है कुछ महिलाएं उनकी उपस्थिति पर कानाफूसी करती रहती। सुलोचना पढ़ी लिखी नहीं हैं, यही उनके लिए वरदान है । यदि वे फुसफुसाहट पर ध्यान देती तो उनके मन में दुःख, गुस्सा, अकेलापन और दूसरों को दोष देने की भावनाएं आना -स्वाभाविक होता ।
            पिछले महीने होली का वाकया भी याद आ गया। होलिका-दहन पर अग्नि के चारों तरफ सुलोचना जी अपने बेटे बहू के साथ परिक्रमा दे रही थी , कई पुरुष भी अपने परिवार के साथ परिक्रमा दे रहे थे । उनका ध्यान अग्नि की तरफ तरह कर सुलोचना जी पर था । उनकी निगाहें 'एतराज' जाहिर कर रही थी । एतराज की भावना क्यों ? सभी को अपने जीवन को अपने ढंग से जीने का हक है , फिर उनके लिए सामाजिक बंधन क्यों ?
            अपने दर्द को भुला कर वे सामाजिक रीति रिवाजों में सहभागिता करें तो हमें सराहना चाहिए । साथ छूटने की पीड़ा झेल रही महिलाएं भी खुशहाल जीवन जी सकें-ऐसा मानवीय माहौल बनाए रखना जरूरी है। उन पर बेवजह बंधन लादना उचित नहीं । पुरानी रूढ़ियों को ढोने की बजाए नए विचारों को हमें ही अपनाना है , नए रिवाज हमें ही बनाने हैं ।

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