अगले महीने दिव्या के भाई की शादी इसी शहर में है । वह देवेंद्र से कई बार कह चुकी-" मुझे एक नई साड़ी दिला दो । मैं नहीं चाहती, शादी में पुरानी साड़ी पहनूँ ।" ऐसा नहीं था -देवेंद्र का हाथ तंग था । घर में इस बात का कई बार जिक्र हो चुका था। 20 वर्षीय बेटा अंशुल भी अपनी मम्मी की फरमाइश सुन चुका था ।
आज देवेंद्र ने घर आ कर दिव्या को एक पैकेट पकड़ाया । दिव्या की आँखें चमकी । उसने पैकेट लेते हुए कुछ पूछना चाहा, उससे पहले ही देवेंद्र बोल पड़ा -" माँ के लिए एक साड़ी लाया हूँ । घर में मेहमान आते जाते रहेंगे । माँ पर यह साड़ी अच्छी लगेगी । तुम इसे फॉल लगा कर तैयार कर देना । हाँ, तुम अपनी साड़ी के लिए मुझ से रुपये ले लेना ।" अंशुल की निगाह पिता पर टिकी हुई है, वह स्तब्ध है, रोज की चर्चा के बारे में सोचने लगा । दिव्या को इस बात का क्षोभ नहीं है कि देवेंद्र उसके लिए साड़ी नहीं लाए। उसे यह सोच कर खुशी है कि एक बेटा अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता है। रिश्ते निभाने के संस्कार घर से ही मिलते हैं । अंशुल देख रहा है , समझेगा। दिव्या के मन में भी अपने भविष्य के प्रति आशा जागी।
आज देवेंद्र ने घर आ कर दिव्या को एक पैकेट पकड़ाया । दिव्या की आँखें चमकी । उसने पैकेट लेते हुए कुछ पूछना चाहा, उससे पहले ही देवेंद्र बोल पड़ा -" माँ के लिए एक साड़ी लाया हूँ । घर में मेहमान आते जाते रहेंगे । माँ पर यह साड़ी अच्छी लगेगी । तुम इसे फॉल लगा कर तैयार कर देना । हाँ, तुम अपनी साड़ी के लिए मुझ से रुपये ले लेना ।" अंशुल की निगाह पिता पर टिकी हुई है, वह स्तब्ध है, रोज की चर्चा के बारे में सोचने लगा । दिव्या को इस बात का क्षोभ नहीं है कि देवेंद्र उसके लिए साड़ी नहीं लाए। उसे यह सोच कर खुशी है कि एक बेटा अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता है। रिश्ते निभाने के संस्कार घर से ही मिलते हैं । अंशुल देख रहा है , समझेगा। दिव्या के मन में भी अपने भविष्य के प्रति आशा जागी।
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