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मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली ,
ये सब हैं मेरी सखी - सहेली |
पतंगों से सतरंगी है आसमान ,
मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान |
कभी डगमगाती , कभी सम्भलती ,
पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती |
जब - जब चरखी है घूमती ,
तब - तब मैं आसमां हूँ छूती |
चाह यही डोर का बंधन ना टूटे ,
संगी साथी का साथ कभी ना छूटे |
लो , एक सखी का साथ छूट गया ,
पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया |
जोशीली आवाज आई - ' वो काटा '
कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा |
कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही ,
कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा |
मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ ,
और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ |
मैं आकाश के सीने को चीर लूँ ,
मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ 

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