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4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |
                                                       1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ले ली | भाईसाहब की नई नौकरी थी , अतः उनका छुट्टी लेना असंभव था | जीजी जवान थी, सो भेजना उचित नहीं था | छोटी बहन आखिर छोटी ही थी | अब रह गई मैं ! पहले तो मैंने आनाकानी की , पर नाकाम रही |
                                                        रात भर घर में कुछ ऐसा वातावरण बना रहा मानो  मुझे किसी युद्धक्षेत्र में भेजा जा रहा हो | सुबह जल्दी उठा दिया गया | वैसे मैंने कभी पूजा- पाठ पर विश्वास नहीं किया , पर रात को घर में हुई बातों ने मुझे 15 मिनट के लिए आस्तिक बना दिया | हनुमान चालीसा पढने में विशेष आनंद आया | घर के सभी सदस्य मेरे प्रति चिंता भाव जाहिर कर रहे थे | छोटी बहन जो सदा मुझ से लड़ती रही मेरी सेवा करने में तत्पर थी | मुस्कराती हुई मेरे सामने चाय नाश्ता रख गई | माँ ने राशन के लिए थैले निकाले और बोली - 'जाते समय भगवान् के आगे हाथ जोड़ना मत भूलना |' भाईसाहब बोले - 'उमा साथ में चटाई या एक आसन ले जाना वर्ना खड़े -खड़े पैर दुखने लगेंगे |' पिताजी ने भी उनका समर्थन किया | दादी बोली - 'बेटी , मुँह मीठा कर लिया ना |' पैरों मै चप्पल डाल ही रही थी कि दादाजी ने अपना पद व्यक्त किया - 'अरी,साथ में कुछ खाने को लेती जा |' उनका कहना भी ठीक ही था | सबेरे -सबेरे पेट में आखिर क्या-क्या डाला जाय | सो एक टिफिन तैयार कर दिया गया | यथासामर्थ्य सभी मेरी मदद कर थे | अब शेष थी जीजी | वे भला पीछे क्यों रहती , बोली - 'एक उपन्यास ले जा पूरी हो जाएगी |'
                                                           खैर, मैं पहुंची राशन की दुकान पर | रास्ते  भर दिल की धडकनें बढ़ती रही | दुकान के पास पहुँच कर देखा तो ऐसी कोई बात नज़र नहीं आई | मेरे दिमाग में तो 'हव्वा ' सवार था | दुकान बंद थी , लोग बाकायदा लाइन में खड़े थे | मैं भी पीछे जा खडी हुई | मैं अपनी जगह से कतार में सबसे आगे खड़े व्यक्ति को पहचानने का प्रयत्न करने लगी , पर दूरी ने साथ नहीं दिया | थोड़ी देर में पैर भी दुखने लगे |आगे बहुतों को बैठा  देख कर मैं चटाई भी बिछा कर बैठ गयी | कुछ देर में उपन्यास भी पढ़ना शुरू कर दिया |
                                                           
                                                            करीब 8 बजे दूकान खुली | दरवाजा खुलना ही था कि कतार सीधी न  होकर आयताकार हो गई | मैं खड़ी हो गई और जरा आगे आ गई | पर इतने में वहां खड़े एक पुलिस अधिकारी कतार को सीधा किया | लोग फटाफट इस तरह  पीछे हुए कि मैं उपन्यास पढ़ते-पढ़ते गिर पड़ी और मेरे ऊपर nदो-तीन | मुझे क्या पता था कि उपन्यास की दिलचस्पी यह रंग लाएगी ! मेरे कपड़े तो खराब हुए ही साथ ही उपहास की पात्रा भी बनी | मुझ से 3-४ नंबर आगे खड़े एक महाशय बहुत ढींगे हांक रहे थे | उनके हर वाक्य से यह ज्ञात होता था कि वे कोई प्रतिष्ठित पद ग्रहण किए हुए हैं | पास खड़े कई अनपढ़ व्यक्ति उनका समर्थन कर रहे थे तो कई उनका मजाक उड़ा रहे थे | कुछ ही देर में अचानक आगे से धक्का आया | सौभाग्यवश  इस समय मैं उपन्यास नहीं पढ़ रही थी , उन महाशय की गप्पें सुन रही थी | यह जोर का धक्का उन महाशय पर जोरदार असर कर गया और वे फुटबाल की तरह दूर जा गिरे | इस पर लोगों ने उनका उपहास किया | वे बेचारे यह कह कर खड़े हुए -'अजी , ऐसा तो होता ही रहता है |' कमर में बहुत जोर की लगने के कारण वे खड़े होते ही पुनः गिर पड़े | एक महोदय ने जोर का ठहाका लगाया -'सच में ऐसा तो होता ही रहता है |' और हंसी से पूरी सड़क गूंज उठी, पर उन महाशय की हालत देखने लायक थी | लाइन में खड़े लोग चिल्लाने लगे ,- ' अरे , कहाँ घुसते हो ? पीछे नंबर पर खड़े रहो |' वे बोले -'भई, चिल्लाते क्यों हो ? अपने नंबर पर ही तो खड़ा हूँ |' लोगों ने इसका गवाह माँगा तो उन्होंने अपने साथी की और इशारा कर दिया , जो अब तक उनका समर्थक बना हुआ था | पर उसने भी आनाकानी कर दी | इस पर उन्होंने अपनी गप्पें याद दिलाई, फिर भी साथी बोला -'अरे, हुई होगी बात मुझे कुछ याद नहीं |' वे महाशय एक हारे खिलाड़ी की तरह पीछे जा खड़े हुए, उन्हें राशन जो लेना था |
                                                                 करीब 11 बजे मेरा नंबर आया | दरवाजे के पास पहुँचते ही दुकानदार बोला- 'बेबी , आधा ही राशन है,सब ख़त्म हो गया  | चाहिए तो ले लो |' पीछे से किसी की आवाज आई- 'जी, इन्हें नहीं चाहिए तो हमें दे देना |' खैर ,वह आधा राशन लिया और मेरे खिसकते ही दरवाजे पर 'ताले महोदय' को लटका दिया गया | अपने पीछे खड़े लोगों को देखकर मैंने स्वयं को भाग्यशाली समझा | पर होंठों पर 'आधा राशन ' शब्द आते ही ' भाग्यशाली ' शब्द फीका लगने लगा |
                                                                    पैर बहुत दुःख रहे थे | भूख भी लग रही थी ,पेट गुड-गुड कर रहा था | मैंने सोचा - घर तो काफी दूर है | थोड़ी देर यहाँ बैठ कर टिफ़िन खा लिया जाए | पर मन विजय की उमंगें उठ रही थी , अतः घर पर जल्द जाना ही उचित समझा |


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