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शुचि

            मैं 'राशि' एक दत्तक पुत्री। मैंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मेरे जैविक माता पिता कौन हैं, क्योंकि मैं अपने जीवन से बहुत खुश थी। किसी तरह का मलाल अपने मन में नहीं लाना चाहती थी। जरूर उन्हें मेरी जरूरत नहीं थी और इन्हें मेरी बहुत जरूरत थी। कहते हैं- पालने वाला जन्म देने वालों से बड़ा होता है। उनके द्वारा मैं तिरस्कृत हुई, पर यहां सिर आंखों पर बिठाई गई। माँ ने तो मेरे लिए नौकरी ही छोड़ दी। मेरे माता पिता ने मुझे भरपूर प्यार, संरक्षण, संस्कार और अच्छी शिक्षा दी। उच्चतम शिक्षा के लिए मैं विदेश गई, वहीं कुछ महीने नौकरी भी की। इस बीच रोहन से मुलाकात हुई। हम दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। रोहन को विश्वास था कि उसके माता पिता उसकी पसंद पर कोई एतराज नहीं करेंगे। पर यह बात मैं दावे के साथ नही कह सकती थी। मैंने रोहन को बता दिया था कि मेरे माता पिता के निर्णय पर ही रिश्ता कायम रख सकूंगी। हम दोनों भारत आए। दोनों के माता पिता को रिश्ता पसन्द आया। एक वर्ष के भीतर हमारी शादी हो गई। मेरी नौकरी जारी ही थी।
            पीहर और ससुराल एक ही शहर में होने से शुरू में तो संभालने में कोई दिक्कत नहीं आई। धीरे-धीरे नौकरी की जिम्मेदारी बढ़ने लगी, इधर इन चारों बड़ों के स्वास्थ्य में भी अंतर आने लगा। शादी के दो वर्ष निकल गए। माँ और सास का दबाव शुरू हो गया था- 'परिवार कब बढ़ाओगे? वंश, समाज तो ऐसे ही बढ़ते हैं।' नौकरी और बड़ों की जिम्मेदारी को देखते हुए हम दोनों ने फैसला किया- 'अभी हम बच्चा नहीं करेंगे।'
            उस दिन मैं ऑफिस से जल्दी आ गई थी। मेरी सहेली सीमा के बेटे के पहले जन्मदिन की पार्टी में जाना था। घर से निकली ही थी, दो बच्चियाँ मुझ से लिपट गई- 'ओह, दीदी आप बहुत सुंदर लग रही हो। आप के झुमके आप पर सूट कर रहे हैं।' प्रायः ऑफिस से आने पर ये बच्चे लॉन में खेलते हुए मिल जाते हैं। इनका आत्मीयता दिखाने का अंदाज अनोखा है। मैं भी इनके लिए पर्स में छोटा-मोटा उपहार रखती हूँ। मैं सीमा के घर पहुंच गई। बहुत मेहमान थे। सीमा और उसके पति को बधाई दी। सीमा के सास ससुर जी को प्रणाम किया और मैं बैठ गई। थोड़ी देर में सीमा बेटे को ले कर आई, बोली- "राशि, थोड़ी देर इसे संभाल। मैं मेहमानों को अटेंड करती हूं।" इस से पूर्व मैंने कभी किसी बच्चे को गोद में नहीं लिया था। पहली बार बच्चे को गोद में ले कर अलग अनुभूति हो रही थी। बच्चा कभी मुझे देखता, कभी मेरे कान के झुमके पकड़ने की कोशिश करता, मुस्कराता। मैंने नाराजगी जाहिर करते हुए गाल फुलाए तो किलकारी मार कर हँसने लगा। बच्चे की उंगलियों के स्पर्श मेरे भीतर सिहरन पैदा कर गया। बच्चे की महक ने अंदर के ममत्व को जगा दिया। काफी देर बाद सीमा आई, बोली- "ओह, राशि, इसने तुम्हें परेशान तो नहीं किया ! आओ, केक काटने की तैयारी हो गई है।" पार्टी पूरी हुई, मैं घर आ गई। रात हो गई, पर मेरी आँखों में नींद कहाँ? 
            यह तो सच है कि पारिवारिक आर्थिक सुदृढ़ता को कायम रखने के लिए मैंने नौकरी जारी रखी। ऐसे में मेरे पास दो ही रास्ते हैं- या तो मैं मातृत्व दायित्व निभाने के लिए नौकरी छोड़ दूँ या पेशेवर जिंदगी को बनाए रखने के लिए माँ बनने से बंचू। आत्मनिर्भरता का रास्ता परिवार को आर्थिक सुदृढ़ीकरण तो दे रहा है, पर क्या जीवन इसी तरह चलता रहेगा! दैनिक जीवन में हम हमेशा मशीन का पुर्जा बन गए हैं। तय गति से तय रास्ते पर चले जाना है। हमारे विवाह को पांच वर्ष हो गए हैं।
            रात भर भीतर एक द्वंद्व चलता रहा। याद हो आया- पिछले महीने एक फंक्शन में सब इकट्ठे हुए थे, मुझे देख कर चाची जी और बुआ जी फुसफुसा रही थी, एक दूसरे के कान में कुछ कह रही थी। बुआ जी की बेटी ने देखा। मेरे कमरे से बाहर निकलने पर उन्होंने अपनी माँ से एतराज किया तो वे बोली- "किसी का दिल न दुखे इसलिए इशारों में बात कर रहे थे।" उनसे पूछा जाए किसी का दिल दुखने की आपको चिंता होती तो उसी की मौजूदगी में ऐसी हरकत करने से गुरेज करती। घर की महिलाएं ही मेरे मातृत्व पर उंगली उठाने लगी।
            पत्थरों के ढेर के बीच दरार में एक पौधा निकल आता है। हमें पता नहीं चलता, वहां दबे बीज को कब नमी और अनुकूल वातावरण मिल गया और अँखुआ गया, लहलहा गया। मेरे अंदर भी दबा हुआ ममत्व जाग गया। बच्चे का स्पर्श, किलकारी, एक अनुभूति दे गया, एक सुखद परिणाम दे गया। सबेरा होने को है। मैं उठ गई- आज मुझे मेरी भावनाओं को रूप देना होगा, एक निर्णय लेना होगा। जानती हूं-रोहन को मेरे निर्णय से कोई एतराज नहीं होगा। सभी के चेहरे जरूर खिल जाएंगे। नाश्ते के लिए हम साथ बैठे थे। मैंने सासुजी को संबोधित करते हुए कहा- "माँ, मैं घर में खुशियां बढ़ाना चाहती हूँ। मेरी ख्वाहिश है-हम पालना गृह से एक बच्ची गोद ले लें। सासुजी प्रसन्न हुई बोली- "तुम्हारे द्वारा एक अनाथ बच्चे का जीवन संवर जाएगा। घर में सभी चेहरों पर मुस्कान आ जाएगी।।" चाहत, साक्षरता, आधुनिक दृष्टिकोण के कारण विचारों में मतभेद नहीं हुआ।
            हम पालना गृह पहुंचे- बच्चों के बीच एक 5-6 महीने की बच्ची घायल अवस्था में दिखी। उसके गाल पर खरोंचे थी और हाथ पैर पर पट्टी बंधी हुई थी। सासुजी ने उस बच्ची के बारे में जानना चाहा। पता चला- रोड एक्सीडेंट में उसके माता पिता मर गए और यह घायल हो गई। इसके रिश्तेदारों ने इसे स्वीकारने से मना कर दिया।, इसलिए इसे यही रखना पड़ा। बच्ची का मर्म, जिस से वह अनजान है, हमारे दिल को आहत कर गया। हमने तय कर लिया-इस बच्ची को ही अपना बना लेंगे। 
            शुचि को लाते ही मेरे माता -पिता भी हमारे पास आ गए। वे भी अपनी नातिन के साथ रह कर जीवन की खुशियाँ बढ़ा लेना चाहते थे। मेरा प्रमोशन हो गया। मुझे और रोहन को छह महीने का मातृत्व-पितृत्व अवकाश मिल गया। शुचि का हर नया प्रयास हम अपने कैमरे में कैद करने लगे। शुचि के हर काम में रोहन आगे रहते।  शुचि हमारी बिटिया तीन वर्ष की हो गई है। मैं घर से ऑफिस का काम करने लगी। जब कभी मुझे ऑफिस जाना पड़ता है- रोहन घर में रुक जाते हैं। शुचि हम सभी के चेहरों की मुस्कराहट बन गई है।
     

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