आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |
मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन में बड़ी आत्मीयता झलकती है |
आज हमारे घर में दोनों चाचाजी का परिवार भी आया है | तीज-त्यौहारों, उत्सवों में हम सभी का एकत्र होना एक आम बात है | फिर आज तो खास दिन है | गाडी का हॉर्न सुनाई दिया | भैया और भाभी गाडी से उतरे | उन्होंने गाडी का दरवाजा खोला और अम्मा धीरे से उतरी | जब तक घर के सभी लोग बाहर आ गए | सभी को देख अम्मा मुस्कराई | उनकी मुस्कराहट उनके स्वस्थ होने का सन्देश दे रही है |
दिन भर हंसी-ठिठोली चलती रही |अम्मा की अनुपस्थिति में हुए घर के, मोहल्ले के किस्से दोहराए गए | शाम तक दोनों चाचाजी के परिवार भी चले गए | अम्मा काफी थक गई | बचपन से ही मैं अम्मा के कमरे मैं ही सोया करती | आज मैं बहुत खुश हूँ | कमरे में अम्मा के होने का आभास ही मानों मुझे गहरी नींद देगा | अम्मा की उपस्थिति रहने मात्र से ही पूरा घर मानों निश्चिंत हो जाया करता है | कहते हैं - एक बड़े उपवन में एक छायादार बड़ा वृक्ष हो तो कई प्राणियों को उसके नीचे सुकून मिल जाता है | इसी तरह हमारी अम्मा हैं |
तीन- चार दिन तो मोहल्ले भर के लोग अम्मा के हाल चाल पूछने आते रहे | सुबह कब होती , रात कब हो जाती - पता न चलता ! एक रात अम्मा अपने बिस्तर पर लेटी थी , कमरे में दूसरी तरफ मेरा पलंग बिछा था | मैं एक पुस्तक पढ़ने में व्यस्त थी | काफी देर बाद देखा - अम्मा करवटें ही बदल रही हैं , उन्हें नींद नहीं आ रही | मैंने पुस्तक रखी और अम्मा के बगल में आ कर लेट गई | मेरे लेटते ही वे थोड़ी विचलित हो गई और मुझ से बोली -'रमा , जा तू अपने पलंग पर |' पर मैं भी हठी बनकर उनसे चिपटी रही | अम्मा झल्लाती रही , पर मैं वहीं सो गई | सुबह आँख खुली तो देखा - अम्मा मेरे पलंग पर सो रही हैं | मेरा मन क्षणिक उदास हुआ कि अम्मा मुझसे दूर क्यों सोई ? पर रोजमर्रा की व्यस्तता में मैं बात भूल गई |
अगली रात - मुझे याद हो आया कि अम्मा मुझसे दूर जाकर सो गई थी | मैं पुस्तक में नजरें गड़ाने का नाटक करते हुए अम्मा के लेटने का इन्तजार करती रही | वे कमरे में आ गई और लेट गई | बस, अब मुझ से रुका न गया | तुरंत उनसे चिपट गई | अम्मा सकपकाई और चिल्लाई -"रमा , तू बड़ी कब होगी ? परे को हट , अपने पलंग पर जा कर सो |" पर मैं मानी नहीं और उनकी गर्दन में अपनी बाहें कस ली | अम्मा ने मेरा हाथ झिड़क दिया और में रुआँसी हो गई -" अम्मा क्या मुझसे कोई गलती हो गई ? क्या आप मुझे प्यार नहीं करती ?" अम्मा की आँखों से आंसू के दो बूंद टपक गए | मैं समझ न सकी, मेरी किस बात से उनका दिल दुखा | अम्मा ने मुझे पुचकारते हुए कहा -" अरी पगली ,तुझे बहुत प्यार करती हूँ ,तभी तो...|"
"अम्मा आप रो क्यों रही हो ?"
" मेरे अस्पताल से आने के दो दिन पहले नन्हीं रूपा मुझसे चिपट कर सोई थी और मर गई |"
''अम्मा , आप क्या कह रही हो ? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा |"
फिर अम्मा ने पूरा किस्सा सुनाया -'' अस्पताल में मेरे बगल के पलंग पर 10 साल की रूपा निमोनिया से पीड़ित थी | रूपा एक साधारण परिवार की इकलौती संतान थी | उसके माँ -बाप दोनों नौकरीपेशा हैं | रूपा धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही थी | पर एक रात उसे बहुत तेज बुखार हो गया | अस्पताल में उसके घर का कोई सदस्य नहीं था | नर्स देखभाल कर रही थी | पर रूपा बुखार की तपन से कराह रही थी | मेरे पास आ कर लेट गई | दवा-सुश्रुषा से धीरे-धीरे बुखार कम हुआ , मैं उसे सहलाती रही | पूरी रात रूपा को मेरे पास सोते रहने के लिए मैंने नर्स को मना लिया | भोर में आँख खुली तो देखा - रूपा निर्जीव पड़ी है , उसकी साँसे बंद हो गई हैं | तब से हर रात रूपा का चेहरा मेरी आँखों के सामने आता है और मन कचोटता है - ऐसा क्यों हुआ ? रमा , अब तुझे भी अपने पास सुलाने से डरती हूँ | ''
परिस्थितिजन्य भय से अम्मा कमजोर हो गई हैं | एक हुए हादसे ने अम्मा को कमजोर कर दिया जो कि मुझे मंजूर नहीं | यदि अम्मा के इस भय से मैं भयभीत हो जाती हूँ तो अम्मा से कभी चिपट कर नहीं सो सकूंगी | मुझ में इतनी समझ तो है कि अपनी अम्मा के मन में बसे दहशत को निकाल सकूँ | मैंने कहा- ''अम्मा मैं इतने वर्षों से आपके पास सोती रही हूँ | रात में जब भयानक सपनों से मैं कांप उठती हूँ , घबरा जाती हूँ - तब आप ही तो मुझे सहलाती रहती हो | फिर भला , आपके पास सोने से मुझे कोई नुकसान कैसे हो सकता है ? '' यह कह कर मैंने अम्मा के गले में अपनी बाहें डाल दी | अम्मा ने मुझे अपनी छाती से लगा लिया | मुझे कब नींद आ गई - पता न चला |
मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन में बड़ी आत्मीयता झलकती है |
आज हमारे घर में दोनों चाचाजी का परिवार भी आया है | तीज-त्यौहारों, उत्सवों में हम सभी का एकत्र होना एक आम बात है | फिर आज तो खास दिन है | गाडी का हॉर्न सुनाई दिया | भैया और भाभी गाडी से उतरे | उन्होंने गाडी का दरवाजा खोला और अम्मा धीरे से उतरी | जब तक घर के सभी लोग बाहर आ गए | सभी को देख अम्मा मुस्कराई | उनकी मुस्कराहट उनके स्वस्थ होने का सन्देश दे रही है |
दिन भर हंसी-ठिठोली चलती रही |अम्मा की अनुपस्थिति में हुए घर के, मोहल्ले के किस्से दोहराए गए | शाम तक दोनों चाचाजी के परिवार भी चले गए | अम्मा काफी थक गई | बचपन से ही मैं अम्मा के कमरे मैं ही सोया करती | आज मैं बहुत खुश हूँ | कमरे में अम्मा के होने का आभास ही मानों मुझे गहरी नींद देगा | अम्मा की उपस्थिति रहने मात्र से ही पूरा घर मानों निश्चिंत हो जाया करता है | कहते हैं - एक बड़े उपवन में एक छायादार बड़ा वृक्ष हो तो कई प्राणियों को उसके नीचे सुकून मिल जाता है | इसी तरह हमारी अम्मा हैं |
तीन- चार दिन तो मोहल्ले भर के लोग अम्मा के हाल चाल पूछने आते रहे | सुबह कब होती , रात कब हो जाती - पता न चलता ! एक रात अम्मा अपने बिस्तर पर लेटी थी , कमरे में दूसरी तरफ मेरा पलंग बिछा था | मैं एक पुस्तक पढ़ने में व्यस्त थी | काफी देर बाद देखा - अम्मा करवटें ही बदल रही हैं , उन्हें नींद नहीं आ रही | मैंने पुस्तक रखी और अम्मा के बगल में आ कर लेट गई | मेरे लेटते ही वे थोड़ी विचलित हो गई और मुझ से बोली -'रमा , जा तू अपने पलंग पर |' पर मैं भी हठी बनकर उनसे चिपटी रही | अम्मा झल्लाती रही , पर मैं वहीं सो गई | सुबह आँख खुली तो देखा - अम्मा मेरे पलंग पर सो रही हैं | मेरा मन क्षणिक उदास हुआ कि अम्मा मुझसे दूर क्यों सोई ? पर रोजमर्रा की व्यस्तता में मैं बात भूल गई |
अगली रात - मुझे याद हो आया कि अम्मा मुझसे दूर जाकर सो गई थी | मैं पुस्तक में नजरें गड़ाने का नाटक करते हुए अम्मा के लेटने का इन्तजार करती रही | वे कमरे में आ गई और लेट गई | बस, अब मुझ से रुका न गया | तुरंत उनसे चिपट गई | अम्मा सकपकाई और चिल्लाई -"रमा , तू बड़ी कब होगी ? परे को हट , अपने पलंग पर जा कर सो |" पर मैं मानी नहीं और उनकी गर्दन में अपनी बाहें कस ली | अम्मा ने मेरा हाथ झिड़क दिया और में रुआँसी हो गई -" अम्मा क्या मुझसे कोई गलती हो गई ? क्या आप मुझे प्यार नहीं करती ?" अम्मा की आँखों से आंसू के दो बूंद टपक गए | मैं समझ न सकी, मेरी किस बात से उनका दिल दुखा | अम्मा ने मुझे पुचकारते हुए कहा -" अरी पगली ,तुझे बहुत प्यार करती हूँ ,तभी तो...|"
"अम्मा आप रो क्यों रही हो ?"
" मेरे अस्पताल से आने के दो दिन पहले नन्हीं रूपा मुझसे चिपट कर सोई थी और मर गई |"
''अम्मा , आप क्या कह रही हो ? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा |"
फिर अम्मा ने पूरा किस्सा सुनाया -'' अस्पताल में मेरे बगल के पलंग पर 10 साल की रूपा निमोनिया से पीड़ित थी | रूपा एक साधारण परिवार की इकलौती संतान थी | उसके माँ -बाप दोनों नौकरीपेशा हैं | रूपा धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही थी | पर एक रात उसे बहुत तेज बुखार हो गया | अस्पताल में उसके घर का कोई सदस्य नहीं था | नर्स देखभाल कर रही थी | पर रूपा बुखार की तपन से कराह रही थी | मेरे पास आ कर लेट गई | दवा-सुश्रुषा से धीरे-धीरे बुखार कम हुआ , मैं उसे सहलाती रही | पूरी रात रूपा को मेरे पास सोते रहने के लिए मैंने नर्स को मना लिया | भोर में आँख खुली तो देखा - रूपा निर्जीव पड़ी है , उसकी साँसे बंद हो गई हैं | तब से हर रात रूपा का चेहरा मेरी आँखों के सामने आता है और मन कचोटता है - ऐसा क्यों हुआ ? रमा , अब तुझे भी अपने पास सुलाने से डरती हूँ | ''
परिस्थितिजन्य भय से अम्मा कमजोर हो गई हैं | एक हुए हादसे ने अम्मा को कमजोर कर दिया जो कि मुझे मंजूर नहीं | यदि अम्मा के इस भय से मैं भयभीत हो जाती हूँ तो अम्मा से कभी चिपट कर नहीं सो सकूंगी | मुझ में इतनी समझ तो है कि अपनी अम्मा के मन में बसे दहशत को निकाल सकूँ | मैंने कहा- ''अम्मा मैं इतने वर्षों से आपके पास सोती रही हूँ | रात में जब भयानक सपनों से मैं कांप उठती हूँ , घबरा जाती हूँ - तब आप ही तो मुझे सहलाती रहती हो | फिर भला , आपके पास सोने से मुझे कोई नुकसान कैसे हो सकता है ? '' यह कह कर मैंने अम्मा के गले में अपनी बाहें डाल दी | अम्मा ने मुझे अपनी छाती से लगा लिया | मुझे कब नींद आ गई - पता न चला |
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