गत दशहरे पर -
जब रावण को जलते देखा,
तो मिट गई शंका की रेखा |
अब कोई रावण नहीं बचा है ,
लो , फिर एक रावण तैयार खड़ा है |
कागज़ की रावण हम जला रहे ,
पर जिन्दा रावण तो हैं घूम रहे |
अन्याय , अधर्म , अहंकार ,
ये सब ही तो हैं रावण के परिवार |
पग - पग पर दम्भ भरते मेघनाद ,
जो सदा दे रहे रावण का साथ |
मूँदे आँखे हम हैं मौन ,
कुम्भकरण हम नहीं तो कौन !
जब रावण को जलते देखा,
तो मिट गई शंका की रेखा |
अब कोई रावण नहीं बचा है ,
लो , फिर एक रावण तैयार खड़ा है |
कागज़ की रावण हम जला रहे ,
पर जिन्दा रावण तो हैं घूम रहे |
अन्याय , अधर्म , अहंकार ,
ये सब ही तो हैं रावण के परिवार |
पग - पग पर दम्भ भरते मेघनाद ,
जो सदा दे रहे रावण का साथ |
मूँदे आँखे हम हैं मौन ,
कुम्भकरण हम नहीं तो कौन !
Comments
Post a Comment