प्रकाश की आलीशान कोठी - आधुनिक साज सज्जाओं से सुसज्जित - अपनी भव्यता का परिचय दे रही है | घर के बाहर लॉन में मखमली घास , गैरेज में खड़ी गाड़ियाँ सम्पदा के प्रतिक हैं | घर बड़ा है , पर घर में रहने वाले महज चार सदस्य - प्रकाश ,पत्नी श्यामा और दो बेटे | यह कोठी पुश्तैनी नहीं है , बल्कि प्रकाश ने अपनी कमाई से ही इस कोठी को ख़रीदा है | इससे पूर्व यह परिवार दो बेडरूम -रसोई के फ्लैट में रह रहा था | प्रकाश ने एक दुकान से अपना व्यवसाय प्रारंभ किया था | काम धंधा अच्छा चला | दुकान ने बड़ी कंपनी का और फ्लैट ने कोठी का रूप ले लिया | श्यामा एक साधारण गृहिणी है | पहले तो बच्चों के लालन पालन में व्यस्त रही | पर अब फुरसत होने पर भी , साधन और सुख-समृद्धि बढ़ने पर भी इसमें कोई ज्यादा अंतर नहीं आया | नौकर- चाकरों से काम लेना , महंगे कपडे पहन कर महंगे कालीन पर चलने की शालीनता - ये अदब जरुर स्वाभाव में आ गए | हाँ , प्रकाश की जीवन- शैली विपरीत हो गई | बाहर पार्टियों में खाना खाना , शराब पीना , देर रात घर लौटना - प्रकाश के लिए एक आम बात हो गई | वह देर से सोता तो सुबह उठता भी देर से | कभी - कभी तो बच्चों से उसकी कई दिन तक मुलाकात ही नहीं हो पाती - यह बात बच्चों को भी खलने लगी | श्यामा इस तरह के ऐशो - आराम और एकाकी जीवन से ऊब चुकी है |
एक रात बच्चे सो चुके थे | रात 12 बजे के बाद प्रकाश घर लौटा | श्यामा से बोला - " आज बहुत थक गया हूँ | सुबह 10 बजे तक मुझे मत उठाना |"
श्यामा - " आप जल्दी उठते ही कब हो ? आप ने उगता सूरज कई महीनों से नहीं देखा होगा !
प्रकाश - " तुम ताना क्यों मार रही हो ? मैं दिन रात मेहनत कर रहा हूँ , किस के लिए ? तुम लोगों के लिए ! ये सुख - साधन , ये ठाठ - बाट ऐसे खैरात में नहीं आ गए |
श्यामा -" ये ठाठ - बाट परिवार के साथ रह कर ही अच्छे लगते हैं | आप हमारे लिए मेहनत कर रहे हो , पर हम भी पेट को पेट के ढंग से ही भर रहे हैं - खाई जितने चौड़ा तो कर नहीं सकते ! तन पर कपड़े एक के ऊपर एक चढ़ा नहीं सकते ! घर में गाड़ियाँ हैं , पर मैं जाऊं कहाँ और किस के साथ ? बच्चों के साथ समय बिताए आपको कई महीने हो गए | पैसों के पीछे भागते - भागते कहीं बच्चे आपसे दूर न हो जांय | सच बात तो यह कि यह विलासी जीवन आपको बहुत रास आ गया है और इसी लिए इतनी मेहनत कर रहे हो |
श्यामा के वाक्य प्रकाश के मुँह पर तमाचे ही थे - उसकी नींद उड़ चुकी थी |
एक रात बच्चे सो चुके थे | रात 12 बजे के बाद प्रकाश घर लौटा | श्यामा से बोला - " आज बहुत थक गया हूँ | सुबह 10 बजे तक मुझे मत उठाना |"
श्यामा - " आप जल्दी उठते ही कब हो ? आप ने उगता सूरज कई महीनों से नहीं देखा होगा !
प्रकाश - " तुम ताना क्यों मार रही हो ? मैं दिन रात मेहनत कर रहा हूँ , किस के लिए ? तुम लोगों के लिए ! ये सुख - साधन , ये ठाठ - बाट ऐसे खैरात में नहीं आ गए |
श्यामा -" ये ठाठ - बाट परिवार के साथ रह कर ही अच्छे लगते हैं | आप हमारे लिए मेहनत कर रहे हो , पर हम भी पेट को पेट के ढंग से ही भर रहे हैं - खाई जितने चौड़ा तो कर नहीं सकते ! तन पर कपड़े एक के ऊपर एक चढ़ा नहीं सकते ! घर में गाड़ियाँ हैं , पर मैं जाऊं कहाँ और किस के साथ ? बच्चों के साथ समय बिताए आपको कई महीने हो गए | पैसों के पीछे भागते - भागते कहीं बच्चे आपसे दूर न हो जांय | सच बात तो यह कि यह विलासी जीवन आपको बहुत रास आ गया है और इसी लिए इतनी मेहनत कर रहे हो |
श्यामा के वाक्य प्रकाश के मुँह पर तमाचे ही थे - उसकी नींद उड़ चुकी थी |
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