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वरद हस्त रख दो माँ

                                                 हम भारतीयों की धार्मिक प्रवृत्ति बहुत सुयोजित है | हम मंदिर या देवालय जाते हैं | पादुकाओं को  दरवाजे पर छोड़ चौखट पर मस्तक टिकाकर देवता के सामने हाथ जोड़ कर बैठ जाते हैं | हम बिना कुछ कहे - निःशब्द रह कर प्रभु के सामने अपने मन का दामन फैला देते हैं | दोनों हथेलियों को एक दूसरे पर रख कर चरणामृत को लेते हैं , जमीन पर बूंद गिरने से बचाने के लिए सिर पर हाथ फेरते हैं | इन सब के बीच सभी को यह विश्वास तो है ही कि यहाँ बोलना जरुरी नहीं ! कुछ तो है जिस की मौजूदगी हमें यकीन दिलाती रहती है | मंदिर के द्वारा ही एक सच का शिद्दत से यकीन हो जाता है कि इस कायनात के सभी लोग ' सुख की चाह ' रूपी धागे से जुड़े हैं |
                                                   हिन्दुस्तानी तहजीब में आस्था के अलग-अलग रूप हैं | पेड़ की डाल पर चुनरी बाँधकर एक अनबुझे और अनकहे ईश्वर के प्रति जो विश्वास होता है उसकी मिसाल ढूंढ पाना मुश्किल है | चुनरी द्वारा मनौती पूरी होने की आस रहती है | आसें पूरी होती होगी , तभी तो मानी जाती है | जिस तरह फूल के बीच बीज छिपा होता है - उसी तरह यह एक इत्मीनान भरा अहसास है |
                                                     इन दिनों नवरात्र में सभी माँ दुर्गा की भक्ति में सराबोर हैं | आठवें - नवें दिन हम कुंवारी कन्याओं के पद-वंदन करेंगे , उन्हें भोज कराएंगे | यह हमारा विश्वास है , आस्था है कि कुंवारी कन्याओं को भोजन कराने से ही नवरात्र पूरे होंगे - माँ दुर्गा प्रसन्न होंगी | तो क्यों ना गरीब कन्याओं को ही भोजन कराया जाय | संपन्न घर के बच्चे तो आए दिन हलवा पूरी खाते हैं | इन गरीब बच्चो को ऐसा खाना कहाँ मयस्सर ? फिर माँ दुर्गा ने कन्या का कोई रूप तो परिभाषित किया नहीं ! इन्हीं विचारों के साथ माँ की स्तुति करें -
                                                   वरद हस्त सर रख दो
                                                    माँ संकट हरने वाली ||        

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