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ख़ुशी

                                                                      काफी दिनों बाद दोनों बच्चे हॉस्टल से घर आ रहे हैं | स्मिता बहुत खुश है | सुरेश एक छोटे शहर में नौकरी करते  हैं | यहाँ शिक्षा की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण बच्चों को दूसरे शहर के नामी हॉस्टल में डाल दिया | गर्मी की छुट्टियाँ हो रही हैं | कमर में साड़ी के पल्लू को खोंस कर स्मिता के सधे हुए हाथ एक कुशल रसोइये की तरह कभी एक कड़ाही में चल जाते तो कभी दूसरी कड़ाही में ..| गैस के चारों चूल्हों पर रखे  बर्तनों पर क्रमशः दौड़ती नजर उसके कुशल पाक-दक्ष होने का परिचय दे रही है |  कुछ ही देर में विभिन्न व्यंजनों की महक से पूरा घर महक गया | आज दोनों कड़ाही भी बहुत प्रसन्न हैं - लजीज व्यंजनों से लबालब जो हैं |
                                                                       पूरा खाना बनने के बाद स्मिता के हाथों ने खोंसे हुए पल्ले को झटका और माथे पर लुढ़कती बूंदों को पोंछा | पंखे के नीचे इत्मीनान से बैठ गई  | बच्चों के घर में आते ही माहौल में रौनक आ गई | सुरेश और बच्चों के चुटकले , ठहाकों से घर गूंज उठा | थाली में परोसे गए व्यंजनों को देख कर बच्चों की आँखें चमक उठी और उनके चेहरे पर आई चमक ने स्मिता को ख़ुशी से तराबोर कर दिया | वह गर्म फुलके बनाने लगी | सबने भरपूर और बड़े स्वाद से खाना खाया |
                                                                       अपनी बारी आने पर स्मिता को कड़ाही की पेंदी ही नजर आई | उसके हाथ स्वतः अचार के मर्तबान की ओर मुड़ गए | वह बहुत खुश है और मुस्करा रही है | पर वह रिक्त कड़ाही  स्मिता के मुस्कराने का कारण नहीं समझ पाई |

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