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एक भरोसा

                                          बुआ से लगाव मुझे सदा रहा | या यूँ कहो - बुआ के लिए मैं भी प्रिय भतीजा रहा | जिंदगी में उन रिश्तों की उम्र लम्बी नहीं होती , जो एकतरफा होते  हैं | बुआ की आत्मिक वात्सल्यता और मेरे दिल में उनके प्रति सम्मान में कभी कमी नहीं आई | बस , मेरे दिल में एक टीस से आत्मग्लानि बनी हुई है | पता नहीं - उनसे एक झूठ बोलकर मैंने सही किया या गलत !
                                          पिछले वर्ष उनकी तबियत काफी नरम हो गई थी , उन्हें अस्पताल में भर्ती करा गया | उनके शरीर को अतिरिक्त खून की सख्त जरुरत थी | घर के सभी स्वस्थ सदस्यों के खून की जाँच हुई, पर किसी से उनका खून मेल नहीं खाया | उस समय मैंने भी अपने खून की जाँच कराई | अन्ततः बुआ को किसी अनजान ब्लड - डोनर के द्वारा ही खून दिया गया | खून तो शरीर में बहता है , वह व्यक्ति कौन है ? किस जाति का है ? इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता , बस बुआ बच गई | अस्पताल के नियम के अनुसार हमें २ शीशी रक्त की अस्पताल को दान करनी थी | मैं एक शीशी रक्त दान करने को तैयार हो गया | रक्तदान करके नर्स के कहे अनुसार रुई का फोहा दबाकर पलंग से उठा और बुआ के कमरे में आ गया | बुआ होश में आ चुकी थी | मेरे हाथ से रुई का फोहा दबा देख कर उन्होंने अनुमान लगाया कि उन्हें मैंने ही खून दिया है | हल्का सा मुस्कराती हुई बोली - " बेटा , तुझ में मेरा नहीं , मुझ में  तेरा खून दौड़ रहा है | क्यों रे , तूने ही मुझे खून दिया है ना !
                                          उनके थके चेहरे पर आई मुस्कान देख कर न चाहते हुए भी मैं  उनकी हाँ में हाँ मिला गया | जिस विश्वास का बुआ ने दंभ भरा , उससे तो मानो मेरा वजन कई गुना बढ़ गया | बुआ ने सदा मुझ पर स्नेह रखा , बिना नाप - तौल के  | इस समय उनके स्वास्थ्य को देखते हुए  उनके विश्वास को बनाए रखना ही उचित था , वर्ना जाति , धर्म उनके विचारों में तूफ़ान ला देता |
                                             अस्पताल से घर आने के बाद रिश्तेदार बुआ से मिलने आया करते | वे सबसे यह कहना न भूलती कि ' मैं राजीव के खून से ही स्वस्थ हुई हूँ | '| मैंने भी उस भ्रम को भ्रम ही बनाए रखा है  , जिस से बुआ जी की ममता , बरगद सी छांव दिनों दिन बढ़ती रहे |

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