Skip to main content

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |
                                          मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिलती थी , बच्चों को पढ़ाना भी पढता था | परेश की हमेशा ख्वाहिश रही उनके बच्चे खूब पढ़े ,होनहार बने | बच्चों को होनहार बनाने के लिए उनकी माँ का शिक्षित होना जरुरी है | इसीलिए परेश ने प्रतिभा से पहले कितनी ही लड़कियों को नापसंद कर दिया था | परेश के घर में शिक्षा का अभाव ही था | एक पढ़ी लिखी पत्नी ला कर वह अपने परिवार में परिवर्तन लाना चाहता था | प्रतिभा ग्रेज्युएट है |
                                          समय भागते देर नहीं लगती | अब बच्चे बड़े हो गए हैं- खुद पढ़ाई कर लेते हैं | सास-ससुर गाँव के पुश्तैनी घर में रहने लगे हैं | अब तो प्रतिभा का पूरा समय घड़ी की सुई से बंधा हुआ है | या यूँ कहे जिस तरह घड़ी की सुई टिक-टिक कर आगे चल रही है , उसी तरह जीवन सरक रहा है | इस समय मिता  कम्प्यूटर के आगे बैठी है और दीप अपने दोस्तों के पास चला गया है | प्रतिभा खिड़की से बाहर झाँकने लगी - यह महिला कौन है , पहचानी सी लग रही है | थोड़ी देर में एक बच्ची उस महिला के पास आ कर खड़ी हो गई | यह बच्ची तो मिसेज वर्मा की सुमी है | कहीं ये मिसेज वर्मा तो नहीं ! अरे , हाँ मिसेज वर्मा ही तो हैं | रोज साड़ी पहनने वाली मिसेज वर्मा आज सूट में हैं - अलग सी तो लगनी ही थी |  अच्छा , वर्मा जी भी आ गए | पहनावे के परिवर्तन से मिसेज वर्मा का व्यक्तित्व ही बदल गया | प्रतिभा सोचने लगी - जरा सा बदलाव - मिसेज वर्मा तो बहुत स्मार्ट लग रही हैं |
                                            मिता ने आवाज दी -"माँ भूख लगी है |" प्रतिभा ने भी घड़ी की और देखा - हाँ , शाम के 6 बजे हैं,  अभी मिता को कुछ नाश्ता दे दूँ | फिर खाना बना लूँ | तब तक दीप भी आ जायेगा और परेश भी | थोड़ी देर में खाना भी बन गया | देखते- देखते रात हो गई | खाना खा कर सभी सो गए | पर प्रतिभा की तो आँखों में मानो नींद ही नहीं |  सोचती रही- ' मेरा जीवन बोनसाई बन कर रह गया है | बोनसाई - चाहतों और इच्छाओं पर लगे विराम का दूसरा नाम ही तो है | जीवन इस तरह नीरस बना रहा तो दूभर हो जायेगा | थमा हुआ पानी भी काई ही पैदा करता है , पर जिम्मेदारियों से भागा भी नहीं जा सकता | मैं शिक्षित हूँ- अपने रोज के कार्यों में परिवर्तन लाना जरुरी है | उड़ने के लिए पक्षी जमीन छोड़ता है और बाद में अपने घोंसले में आ ही जाता है | ' रात काफी बीत चुकी , प्रतिभा सो गई | सुबह जल्दी उठना है |
                                               सुबह घड़ी के अलार्म ने प्रतिभा की आँख खोल दी | नाश्ता , टिफिन तैयार करके सब को बिदा कर दिया | एक राहत की साँस ली | कुर्सी पर बैठ गई | सामने आज का अखबार रखा है ,उस पर नजर डाली -' कम्प्यूटर क्लासेस ' | प्रतिभा ने ध्यान से पढ़ा | समय है - सुबह 10 से शाम 5 बजे के बीच | सोचने लगी ' क्या मैं इस क्लास में दाखिला नहीं ले सकती ? है भी घर के पास | एक बार जा कर देखने में हर्ज़ ही क्या है  ? ' प्रतिभा फटाफट तैयार हुई और वहाँ पहुँच गई | प्रतिभा यह देख कर दंग रह गई - वहां उसकी उम्र के कई पुरुष - महिलाएं कम्प्यूटर की जानकारी ले रहे थे- जरुर इन्होनें क्लास में दाखिला लिया होगा | प्रतिभा ने भी दाखिला ले लिया | दोपहर 11 से 12 के बीच का समय क्लास के लिए तय कर लिया |
                                                  प्रतिभा नेजीवन में एक कदम उठा लिया था | क्लास से आने के बाद घर पर भी कम्प्यूटर पर थोडा अभ्यास कर लेती | धीरे-धीरे रूचि दिनों दिन बढ़ने लगी | कभी गेम खेल लेती , कभी कोई विडियो देख लेती , नई नई जानकारी पाने लगी | अब तो घर के दैनिक कार्यों  को जल्द ही पूरा करने का उत्साह बना रहता | बाहरी दुनिया की जानकारी ने उसकी कुतूहलता बढ़ा दी | एक छोटे से कदम से उसके जीवन में बदलाव आ गया था | अब जीवन बोनसाई नहीं रहा , वह खुले आकाश और धरती के बीच खुली सांस लेने लगा |

Comments

Popular posts from this blog

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ