उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,
निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक
बजे थे छः उदित सुबह के ,
जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |
दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,
बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |
स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,
हुई यह छोटी सी गलती उससे
'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,
करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |
अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,
भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |
उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,
पर करा नीचे कुछ सोचकर |
चले गए वे यह बड़बड़ाकर -
'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|
मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,
चल पड़ी मै कुछ पग आगे |
दिख पड़ा मुझे एक आदम विशालकाय,
जिससे चला बड़ी मुश्किल से जाय|
आगे था एक क्षीण बालक ,
शायद वे थे उसके मालक |
सिर पर ढो रहा सामान नंबरबाय ,
उससे चला न बिलकुल जाय |
मालक था शरीर से मस्त ,
बालक था बोझ से त्रस्त |
कैसा है यह चित्र करूणाति |
हाय कैसी है यह नियति !
कुछ पल में मैं थी दोराहे पर ,
क्या दिखेगा अब यह था डर !
थी छोटी झोपड़ियाँ एक राह पर ,
थे प्रसाद भवन अन्य राह पर |
स्मरित हो आया वह बालक ,
जिस के पीछे चल रहा था मालक |
थे कई शिथिल बालक राह पर,
न जाने कैसे बनेंगे ये नर !
भूख-प्यास से थे व्याकुल |
दाने-दाने को थे नेत्र आकुल |
कैसा है यह भीषण अकाल ,
मानो खड़ा है समक्ष नर कंकाल |
मुड़े नेत्र अन्य राह पर,
दिख पड़ी सम्पत्ति अपार |
पिला रहे सेठ बिल्ली को दुग्ध ,
शायद थी वह उनसे रुद्ध|
मनाते थे , इठलाते थे ,
पर बिना पिलाए न रहते थे |
कैसे हैं ये करुण दृश्य
क्या इसमें है कुछ रहस्य |
लौट चली , हो चुका सूर्योदय ,
पर कब होगा इनका भाग्योदय |
क्या यही है समाज गाँधीवाद ,
क्या यही है उसका नाद ?
कहते हैं- 'हम एक हैं '
क्या यही उनका नेक है ?
है रहा सदा धन ऊँचा ,
करता रहा निर्बल को नीचा |
पर होगा यह ख़त्म एक दिन ,
दूर न समझो अब वह दिन |
निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक
बजे थे छः उदित सुबह के ,
जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |
दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,
बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |
स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,
हुई यह छोटी सी गलती उससे
'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,
करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |
अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,
भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |
उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,
पर करा नीचे कुछ सोचकर |
चले गए वे यह बड़बड़ाकर -
'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|
मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,
चल पड़ी मै कुछ पग आगे |
दिख पड़ा मुझे एक आदम विशालकाय,
जिससे चला बड़ी मुश्किल से जाय|
आगे था एक क्षीण बालक ,
शायद वे थे उसके मालक |
सिर पर ढो रहा सामान नंबरबाय ,
उससे चला न बिलकुल जाय |
मालक था शरीर से मस्त ,
बालक था बोझ से त्रस्त |
कैसा है यह चित्र करूणाति |
हाय कैसी है यह नियति !
कुछ पल में मैं थी दोराहे पर ,
क्या दिखेगा अब यह था डर !
थी छोटी झोपड़ियाँ एक राह पर ,
थे प्रसाद भवन अन्य राह पर |
स्मरित हो आया वह बालक ,
जिस के पीछे चल रहा था मालक |
थे कई शिथिल बालक राह पर,
न जाने कैसे बनेंगे ये नर !
भूख-प्यास से थे व्याकुल |
दाने-दाने को थे नेत्र आकुल |
कैसा है यह भीषण अकाल ,
मानो खड़ा है समक्ष नर कंकाल |
मुड़े नेत्र अन्य राह पर,
दिख पड़ी सम्पत्ति अपार |
पिला रहे सेठ बिल्ली को दुग्ध ,
शायद थी वह उनसे रुद्ध|
मनाते थे , इठलाते थे ,
पर बिना पिलाए न रहते थे |
कैसे हैं ये करुण दृश्य
क्या इसमें है कुछ रहस्य |
लौट चली , हो चुका सूर्योदय ,
पर कब होगा इनका भाग्योदय |
क्या यही है समाज गाँधीवाद ,
क्या यही है उसका नाद ?
कहते हैं- 'हम एक हैं '
क्या यही उनका नेक है ?
है रहा सदा धन ऊँचा ,
करता रहा निर्बल को नीचा |
पर होगा यह ख़त्म एक दिन ,
दूर न समझो अब वह दिन |
Comments
Post a Comment