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चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,
      निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक
      बजे थे छः उदित सुबह के ,
      जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |
      दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,
      बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |
      स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,
      हुई यह छोटी सी गलती उससे
     'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,
     करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |
     अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,
     भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |
     उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,
     पर करा नीचे कुछ सोचकर |
    चले गए वे यह बड़बड़ाकर -
    'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|

                                  मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,
                                  चल पड़ी मै कुछ पग आगे |
                                  दिख पड़ा मुझे एक आदम विशालकाय,
                                  जिससे चला बड़ी मुश्किल से जाय|
                                  आगे था एक क्षीण बालक ,
                                  शायद वे थे उसके मालक |
                                  सिर पर ढो रहा सामान नंबरबाय ,
                                  उससे चला न बिलकुल जाय |
                                  मालक था शरीर से मस्त ,
                                  बालक था बोझ से त्रस्त |
                                  कैसा है यह चित्र करूणाति |
                                  हाय कैसी है यह नियति !

       कुछ पल में मैं थी दोराहे पर ,
       क्या दिखेगा अब यह था डर !
      थी छोटी झोपड़ियाँ एक राह पर ,
      थे प्रसाद भवन अन्य राह पर |
      स्मरित हो आया वह बालक ,
      जिस के पीछे चल रहा था मालक |
      थे कई शिथिल बालक राह पर,
      न जाने कैसे बनेंगे ये नर !
      भूख-प्यास से थे व्याकुल |
      दाने-दाने को थे नेत्र आकुल |
      कैसा है यह भीषण अकाल ,
      मानो खड़ा है समक्ष नर कंकाल |

                               मुड़े नेत्र अन्य राह पर,
                               दिख पड़ी सम्पत्ति अपार |
                              पिला रहे सेठ बिल्ली को दुग्ध ,
                              शायद थी वह उनसे रुद्ध|
                              मनाते थे , इठलाते थे ,
                              पर बिना पिलाए न रहते थे |
                              कैसे हैं ये करुण दृश्य
                              क्या इसमें है कुछ रहस्य |

      लौट चली , हो चुका सूर्योदय ,
      पर कब होगा इनका भाग्योदय |
      क्या यही है समाज गाँधीवाद ,
     क्या यही है उसका नाद ?
     कहते हैं- 'हम एक हैं '
     क्या यही उनका नेक है ?
     है रहा सदा धन ऊँचा ,
     करता रहा निर्बल को नीचा |
     पर होगा यह  ख़त्म एक दिन ,
     दूर न समझो अब वह दिन |







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