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बातें छोटी छोटी

          कल सुमि कह गए थी-' आंटी, कल हमारे यहां सत्संग ग्रुप घर पर आएगा। मम्मी ने कहा है आप भी आ जाना।' मैंने पूछ ही लिया-'क्या कल तुम्हारे घर सत्संग होगा ?'
' अरे नहीं, वो क्या है, कई दिनों से दादी बीमार हैं, तो मम्मी सत्संग में नहीं जा पा रही हैं। वे सब दादी को देखने आ रही हैं।,
          हमारे घर से कुछ दूरी पर एक घर में सत्संग हुआ करता है। घर की मुखिया शकुंतला देवी काफी सुलझे और सौम्य विचारों की हैं। वे ही जीवन से सम्बंधित बातों पर, पौराणिक कथाओं पर चर्चा करती हैं और महिलाएं 2-3भजन गा लेती हैं। रोज सुबह 11से 12 के बीच यह सत्संग होता है। सुमि की मां वर्मा भाभीजी से मेरी दोस्ती पुरानी है। मैं सत्संग में तो नहीं जा पाती हूँ, पर भाभीजी के द्वारा वहां उल्लेख किए प्रसंग सुन लेती हूं।
          करीब सवा बारह बजे 20-22 महिलाएं घर के बाहर खड़ी थी, उनमें शकुंतला जी भी थी। शकुंतला जी ने घर के बाहर एक किनारे पर चप्पल उतारी, पर किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। सब महिलाएं दरवाजे पर ही चप्पल पटकती हुई घर के अंदर आ गई। शकुन्तलाजी दादी के पास ही कुर्सी पर बैठ गई और उनके हालचाल पूछने लगी। मैं रसोई में गई वर्मा भाभी ने एक बड़ी प्लेट में बिस्किट के तीन पैकेट्स खोल कर फैला दिए थे और एक ट्रे में पानी के कई गिलास। मैं बिस्किट की प्लेट ले कर आई और शकुंतला जी के सामने किया। उन्होंने मुस्कराते हुए 'ना' का इशारा किया। अब मैं इस प्लेट को महिलाओं के पास ले गई। कइयों ने पूरा बिस्किट उठा लिया। कई महिलाओं ने आधा बिस्किट तोड़ा और आधा प्लेट में छोड़ दिया। कनखियों से शकुंतला जी देख रही थी। उनके हाव भाव से जाहिर हो रहा था-महिलाओं की इस प्रतिक्रिया से वे विचलित थी। इतनी देर में सुमि पानी के गिलासों की ट्रे ले आई। शकुन्तलाजी ने एक गिलास उठाया और पूरा पानी पी कर खाली गिलास नीचे रख दिया। जब अन्य महिलाओं को भी पानी के लिए पूछा गया, सभी ने गिलास उठाए और आधा गिलास पानी पी कर वापस ट्रे में रख दिया।
          हमारी भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवतुल्य माना गया है। एक दस्तूर भी है-मेहमान को कोरा पानी नहीं पिलाया जाता है, साथ में हल्का मीठा खाद्य भी दिया जाता है। हमारी संस्कृति यह भी कहती है कि मेहमान मेजबान के आतिथ्य-सत्कार का मान रखे। प्लेट में बिस्किट के लगभग 15 टुकड़े छोड़े गए-जिन्हें फेंकना ही पड़ा। बेहतर होता-एक बिस्किट में दो महिलाएं हिस्सेदारी कर लेती। सवाल सिर्फ बिस्किटों का नहीं है, थाली में भोजन छोड़ना भी एक अक्षम्य अपराध है।
          कई बार कचरे के ढेर में से भोज्य पदार्थ को बीनते गरीब लोगों को हम देखते है। उस समय हम उन्हें दीन भरी  निगाहों से देखते हैं या नफरत से मुंह मोड़ लेते हैं। पर हम यह नहीं सोचते-यह जूठन आई कहाँ से ? अनाज की इतनी बेकद्री हम ही करते हैं। अपनी थाली में हिसाब से भोजन परोसकर शेष भोजन इन गरीबों को सीधे ही दे दें तो पुण्य कर्म से जुड़ जाएंगे। यही नियम पानी के लिए लागू होता है। पीने के लिए पानी लेना हो या नहाने के लिए- लिया उतना ही जाय, जितनी जरूरत हो। आज चारों तरफ पानी की किल्लत है। कई जगहों पर लोग कई किलो मीटर चल कर, ऊँचें दाम दे कर पानी पा रहे हैं। इसलिए पानी का अपव्यय भी एक अक्षम्य गुनाह है।
          प्राकृतिक संसाधनों पर हर व्यक्ति का अधिकार है, हमें कोई अधिकार नहीं हम उसकी बेकद्री, बर्बादी करें-यह कानूनी जुर्म माना जाना चाहिए। आज मानसिक बदलाव की आवश्यकता है। अन्न और जल  की बर्बादी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है । वह समय दूर नहीं, जब भोजन और पानी की लूटपाट मानवीय त्रासदी बन जाएगी।  मानें तो बातें छोटी छोटी हैं, न मानें तो परिणाम बड़े तकलीफदायक होंगे।

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