मेरी पत्नी की पहली डिलीवरी होनी है, वह पीहर चली गई। इस विषय में अनभिज्ञता होने के कारण यह निर्णय ले ही लिया। गाँव में ताई जी को पता चला-'मोनू अकेला है, खाने की दिक्कत होगी।' बैचेन हो गई। अपने मोनू के पास चली आई। मैं मानवेन्द्र, पर मेरी ताई के लिए मोनू। गाँव में हमारा संयुक्त परिवार-ताई, ताऊजी, माता-पिता और हम दो भाई। ताईजी के कोई संतान नहीं हुई। माँ और ताईजी में देवरानी-जेठानी से व्यवहार कम, बहनों-सा प्रेम ज्यादा रहा। ताऊजी जल्दी ही गुजर गए, कुछ वर्षों बाद माँ-पिताजी भी। ताईजी बड़े भैया के पास गाँव में ही रह गई, पर दिल के एक कोने में 'मोनू' के प्रति उनका प्रेम सदा ही उमड़ा। जब तब मेरे पास आई, इन्हें शहरी जीवन रास नहीं आया।
ताईजी को सफाई-धुलाई की आदत है। गाँव में तो नदी बह रही है, पर यहाँ पानी की जटिल समस्या है। सबेरे चार बजे उठकर उन्होंने अपने बाँके बिहारी को नहलाया, फिर खुद.....। दिन भर के खर्चे के हिसाब से जमा पानी की स्थिति देख कर मैं हाथ मुँह धोकर ही ऑफिस गया। ताईजी ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे, पर पानी की तंगी नहीं देखी। उन्हें पता चला- यहाँ पानी बिकता है, तो उनकी आंखों में पानी आ गया।
रविवार का दिन है। ताईजी ने गट्टे की कढ़ी और कैर-सांगरी की सब्जी बनाई है। गाँव में तो अब तक साग सब्जी से भरे डोंगे -कटोरदानों की अदलाबदली हो जाती। यहां तो पड़ोस में कौन है, इसकी जानकारी नहीं, जबकि आने जाने का मार्ग एक है। घर के लोग माँ और ताईजी से इस बात पर नाराज रहते थे कि वे घर पर आए हर इंसान को खाने के लिए पूछ लेती थी। वार-त्यौहारों का एका तो जग-जाहिर था। पड़ोस के घर आए रिश्तेदारों की आवभगत करना, उनकी बिदाई करना-मानो अपने परिजन हों। क्या मिलता था-इन्हें? ताईजी कहती- 'उसे ही जमा करो, जो बांट सको। स्नेह का संचय रहेगा, तो बाँटा जा सकेगा।' मैं समझदार हुआ तो सोचने लगा- 'संचय तो वही होगा, जो हमें मिलेगा!' मुझे अच्छी तरह याद है- एक बार मोहल्ले में एक लड़के से मेरे मतभेद हो गए। वह लड़का मुझे अपशब्द कहने लगा। मैं चुपचाप घर आ गया। बड़े भैया मुझ पर नाराज हुए और बोले- "तू भी उसे सुनाकर आता!" ताईजी ने भैया को डांटा और बोली- "मोनू, तुम्हें जब कोई अपशब्द कहे, तुम किसी स्वादिष्ट वस्तु का नाम ले लेना।" मेरी समझ में बात आई नहीं। वे मुझे पुचकारती हुई बोली- "जो हम उगलते हैं, उसे एक दिन निगलना पड़ता है। वह अपशब्द उगल रहा है, क्या जाने वह उन्हें वापस पाने का मन रखता हो! तुम तो अच्छी चीज ही निगलना।" ऐसी हैं मेरी ताईजी।
ताईजी की कुछ सीखें दिलो-दिमाग में बस गई, जिंदगी में भिन्न-भिन्न रंग भर गई। ताई कमरे की खिड़की के पास खड़ी हैं। मुझसे बोली- "मोनू, यहाँ लोग हाथ पर बंधी घड़ी देखते हैं और भागते है। ऐसा क्यों?" ताईजी को यहाँ की भागती जिन्दगी के बारे में क्या कहूँ? मैं मुस्करा दिया। जब तक गाँव में रहा, ताई का 'राजा बेटा' बनकर ही रहा। मेरे पास आई हैं, इन्हें हर तरह से खुश रखना चाहता हूँ- राजा बेटा बन कर। अब मैं इन्हें गाँव नहीं जाने दूंगा। मेरा मन है-इनके जीवन में खुशियों के रंग भर दूँ।
ताईजी को सफाई-धुलाई की आदत है। गाँव में तो नदी बह रही है, पर यहाँ पानी की जटिल समस्या है। सबेरे चार बजे उठकर उन्होंने अपने बाँके बिहारी को नहलाया, फिर खुद.....। दिन भर के खर्चे के हिसाब से जमा पानी की स्थिति देख कर मैं हाथ मुँह धोकर ही ऑफिस गया। ताईजी ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे, पर पानी की तंगी नहीं देखी। उन्हें पता चला- यहाँ पानी बिकता है, तो उनकी आंखों में पानी आ गया।
रविवार का दिन है। ताईजी ने गट्टे की कढ़ी और कैर-सांगरी की सब्जी बनाई है। गाँव में तो अब तक साग सब्जी से भरे डोंगे -कटोरदानों की अदलाबदली हो जाती। यहां तो पड़ोस में कौन है, इसकी जानकारी नहीं, जबकि आने जाने का मार्ग एक है। घर के लोग माँ और ताईजी से इस बात पर नाराज रहते थे कि वे घर पर आए हर इंसान को खाने के लिए पूछ लेती थी। वार-त्यौहारों का एका तो जग-जाहिर था। पड़ोस के घर आए रिश्तेदारों की आवभगत करना, उनकी बिदाई करना-मानो अपने परिजन हों। क्या मिलता था-इन्हें? ताईजी कहती- 'उसे ही जमा करो, जो बांट सको। स्नेह का संचय रहेगा, तो बाँटा जा सकेगा।' मैं समझदार हुआ तो सोचने लगा- 'संचय तो वही होगा, जो हमें मिलेगा!' मुझे अच्छी तरह याद है- एक बार मोहल्ले में एक लड़के से मेरे मतभेद हो गए। वह लड़का मुझे अपशब्द कहने लगा। मैं चुपचाप घर आ गया। बड़े भैया मुझ पर नाराज हुए और बोले- "तू भी उसे सुनाकर आता!" ताईजी ने भैया को डांटा और बोली- "मोनू, तुम्हें जब कोई अपशब्द कहे, तुम किसी स्वादिष्ट वस्तु का नाम ले लेना।" मेरी समझ में बात आई नहीं। वे मुझे पुचकारती हुई बोली- "जो हम उगलते हैं, उसे एक दिन निगलना पड़ता है। वह अपशब्द उगल रहा है, क्या जाने वह उन्हें वापस पाने का मन रखता हो! तुम तो अच्छी चीज ही निगलना।" ऐसी हैं मेरी ताईजी।
ताईजी की कुछ सीखें दिलो-दिमाग में बस गई, जिंदगी में भिन्न-भिन्न रंग भर गई। ताई कमरे की खिड़की के पास खड़ी हैं। मुझसे बोली- "मोनू, यहाँ लोग हाथ पर बंधी घड़ी देखते हैं और भागते है। ऐसा क्यों?" ताईजी को यहाँ की भागती जिन्दगी के बारे में क्या कहूँ? मैं मुस्करा दिया। जब तक गाँव में रहा, ताई का 'राजा बेटा' बनकर ही रहा। मेरे पास आई हैं, इन्हें हर तरह से खुश रखना चाहता हूँ- राजा बेटा बन कर। अब मैं इन्हें गाँव नहीं जाने दूंगा। मेरा मन है-इनके जीवन में खुशियों के रंग भर दूँ।
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