कर दूँ अभिषिक्त 'शुक्रिया' के बोलों से,
जीवन हुआ सार्थक, इन रिश्तों से।
मंशा यही-स्नेहपूर्ण संबंध बने रहें,
भविष्य में भी लेन-देन यूं ही चलते रहें।
प्रभु, 'शुक्रिया' चुनौती, जोखिम देने के लिए,
जरूरी है जीने की कला सीखने के लिए।
'शुक्रिया' करूँ तो कहाँ, कब तक करूँ?
तेरी हर कृपा के आगे मैं सिर झुकाया करूँ!
शिक्षक, माता-पिता पथ-प्रदर्शक बने रहे,
'शुक्रिया' अस्थिर जीवन को स्थिरता देते रहे।
रिश्ते, सगे-संबंधी बढ़ाते रहे प्रमाद,
सहेज रखी है मैंने उनकी मीठी याद।
'शुक्रिया' जिन्हें देख सदा मैं मुस्कराती रही,
'शुक्रिया'उस सखी का जो सदा हँसाती रही।
'शुक्रिया' जिन्होंने मेरी गलती को इंगित किया,
'शुक्रिया' 'इन' का जिन्होंने हर पल साथ दिया।
साँसों पर अवलम्बित काया चलते चलते हुई चूर,
'शुक्रिया' दो स्नेह शब्द मिले, थकावट हुई दूर ।
रेलयात्रा में एक नन्ही किलकारी दे गई रंग,
'शुक्रिया' पल भर में मेरी बैचेनी हुई भंग।
मेल बढ़ाते, स्नेह बाँटते, उम्र यूं ही गुजर जाए,
आभार तहे दिल से, रिश्ते यूं ही बढ़ते जाएं।
आप सभी ने मुझे इतना प्यार दिया,
'शुक्रिया'मेरे बिखरे शब्दों को कविता बना दिया।
-17 अप्रैल 2019
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