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दायित्व

            रघुनाथ का परिवार छोटा ही था-एक बेटा, एक बेटी। नौकरी के रहते रघुनाथ ने अपना घर बना लिया। दो रूम, बैठक और रसोई-उनके परिवार के लिए पर्याप्त था। दोनों कमरों में शौचालय की व्यवस्था रखी और एक शौचालय आंगन में भी बनवा लिया। दोनों बच्चों की शादी हो गई। बेटी बिदा हो गई, बहू घर आ गई। दूसरा रूम बेटे-बहू के लिए तैयार हो गया। समय बड़े सुख-चैन से बीतता रहा। बेटे अक्षय का परिवार भी बढ़ने लगा। कुछ वर्षों बाद रघुनाथ की पत्नी का देहांत हो गया। पत्नी के देहांत से रघुनाथ को एकाकी जीवन दूभर लगने लगा। वे पूरी तरह से पत्नी के सहयोग के आदी हो गए थे। शारीरिक अशक्तता में पनपी पर निर्भरता से वे कुंठित रहने लगे,पर उन्होंने अपनी टूटन का आभास नहीं होने दिया। धीरे-धीरे जीवन अपनी गति पकड़ने लगा। इधर अक्षय का बेटा हाई स्कूल पास कर चुका।
            आज रघुनाथ का मन हुआ- बेटी से मिल आऊं। दो दिन के लिए बेटी के घर चले गए। दो दिन बाद बेटी ही घर छोड़ने आई। दोनों ने देखा-रघुनाथ की अलमारी बैठक में रख दी गई है और कोने में पलंग भी। उनका कमरा अक्षय के बेटे के लिए तैयार कर दिया गया। 50 वर्षों से रघुनाथ अपने कमरे में सोने के आदी हो गए थे। उस कमरे का हर कोना, हर दिवार संगी साथी लगते। इस उम्र में शौचालय कमरे में ही हो तो आसानी रहती है। अब समय-बेसमय आराम की भी दिक्कत होगी। फेरबदल को ले कर वे मन ही मन कुछ बड़बड़ाए और नई व्यवस्था के लिए स्वयं को तैयार कर लिया, मूक बने रहे। परंतु बेटी कहाँ चुप रहनी थी, इस उपेक्षा से उसका दर्द छलक गया। अपने छोटे भाई से प्रश्न करना उसका हक है-"अक्षय, पापा का पलंग बैठक में क्यों लगा दिया?"
"जीजी, दरअसल अंकित को आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी है, बैठक में पढ़ाई हो ही नहीं पाती है।"
"तो तुम क्या सोचते हो-बैठक में पापा आराम कर पाएंगे! अक्षय हमारे बच्चों के लिए सुविधा जुटाना हमारा दायित्व है। हमारे परिवार की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना-हमारे माता पिता की जिम्मेदारी बिल्कुल नहीं है। यह मकान पापा ने बनाया-हम दोनों की परवरिश की। अब तुम्हें जरूरत है अन्य कमरे की तो ऊपर कमरे बढ़वा लो।"
            अक्षय की नजरें झुक चुकी थी। रघुनाथ का कमरा पूर्ववत व्यवस्थित हो गया। रघुनाथ के कहने पर उनके कमरे के एक कोने में अंकित की पढ़ाई की टेबल लग गई और उस पर एक लैम्प।
            किसके दिल में कितना सम्मान है-बड़ों के प्रति-यह कोई देखने नहीं आता। सबूत दिखता है-माता पिता की देखभाल में। यह ध्यान रहे-इतिहास को हम पर ही दोहराने में ज्यादा वक्त नहीं लेगा।

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