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मां की पाती बेटी के नाम

            प्यारी लाडो, सदा खुश रहो। फोन, व्हाट्सअप द्वारा तुमसे संपर्क बना रहता है। फिर भी पत्र लिख रही हूं, जिससे जब-तब तुम मेरे स्पर्श को अनुभव करती रहो। पत्र द्वारा मैं अपने विचार सांझा कर रही हूं, इसे लिखने में मुझे खुशी और इत्मीनान भी महसूस हो रहा है।
             जानती हो, मैं एक वकील बनना चाहती थी, पर बन न सकी। आज तुम्हारे द्वारा मैं अपना सपना पूरा होते देख रही हूं। जब घर में पुरानी परम्पराओं और रूढ़ियों के विरोध में तुम मेरे हक और अधिकार के लिए सबसे संघर्ष करती थी, तो तुम्हारी दादी मुस्कराकर कहती- 'यह लड़की वकील ही बनेगी, इससे कोई जीत नहीं सकता।' वकालत करने के बाद समाज के प्रति भी तुम्हारी जिम्म्मेदारी बढ़ जाएगी। आज समाज में बहशी, दरिंदे, भूखे आदमखोरों ने आतंक फैला रखा है, तुम्हें इन्हें दंडित कर नारी का मान-सम्मान बढ़ाना होगा। याद है-पिछले वर्ष दहेज प्रथा से प्रताड़ित होकर पड़ोसी गुप्ताजी की बेटी ने आत्महत्या कर ली थी। हम चाहते हैं-तुम दहेज-प्रथा से उत्पीड़ित व नारकीय जीवन झेल रही महिलाओं को न्याय दिलाओ, इन धन-लोलुप दहेजखोरों को दंडित करो। इन जघन्य-अपराधों से सने हाथों को दंडित करना तुम्हारा फर्ज होगा। बेटा, शिक्षा का अर्थ मात्र डिग्री पाना नही है। शिक्षा का अर्थ है- अपनी जिम्मेदारियों को भली भांति स्वीकारते हुए एक अच्छे नागरिक का फर्ज निभाना। तुम हर काम में सक्षम हो, बस खुद पर विश्वास करना होगा। किसी बड़े, अच्छे परिणाम के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता। प्रयास करते रहो, परिणाम अवश्य मिलेगा। मानती हो ना-फल भी समय आने पर ही पकता है!
             हॉस्टल में अलग-अलग स्वभाव की लड़कियों के साथ तुम्हें तालमेल बिठाना पड़ता है। यही तो जीवन है, जो हमें सामंजस्य करना सीखाता है। तुम्हारे भीतर संबंधों की नजाकत समझने के संस्कार एवं व्यवहारिक समझ है। सबके विचार व स्वभाव परखने के लिए तैयार रहो, पर वह तुम्हारे अनुकूल है या नहीं-यह तुम्हें तय करना है। लाडो, जब दोस्ती और आदत जिंदगी को प्रभावित करने लगे तो सोचना जरूरी है। हमेशा स्वाभिमानी रहो, पर अभिमानी नही। सुबह योगा के लिए समय निकाल लेती हो ना! यहाँ तुम सूर्य-नमस्कार करती थी.. करती रहना। खाने पीने में लापरवाही नहीं करना। तुम हमारा मान हो, गुरुर हो। हमारे दिए संस्कार जब तुम्हारे स्वभाव में परिलक्षित होते हैं तो हम गर्व महसूस करते हैं। मैंने तुम्हें चलना सिखाया, पर आज तुम मेरी पथ-प्रदर्शक हो। तुम्हारे सिखाने से मैं फ्री समय में लैपटॉप पर विद्वानों के लेख, जीवनी पढ़ती हूँ। कवि निराला जी की 'सरोज-स्मृति' पढ़ी,एक पिता का पुत्री के प्रति मर्म- मेरे दिल को छू गया। अब शिव खेड़ा की 'जीत आपकी' पढ़ रही हूं। इसमें एक वाक्य है -' जीतने वाले अलग चीजें नहीं करते, वो चीजों को अलग तरह से करते हैं।' वाक्य साधारण है, पर अर्थ गहन है।
 अच्छा बेटा, अपना ध्यान रखना। फोन पर बातें होती रहेंगी।
                                           -तुम्हारी माँ।

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