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और आसमां

          सारे दिन अम्मा सभी को हिदायत दिया करती थी- 'बाहर के हॉल में पंखा कोई नहीं चलाएगा। जरूरत क्या है? कमरे में कई खिड़कियाँ हैं, कमरा हवादार है।' दरअसल घर के आसपास के कई पेड़ हैं, उन पर चिड़ियां चहचहाती रहती हैं। घर में एक खिड़की से घुसती हैं, दूसरी से निकल जाती हैं। पंखा चल रहा हो तो चिड़िया के घायल होने का डर बना रहता है। अम्मा की निगाह कभी चलते पंखे पर चली जाती तो घर में कोहराम मच जाता। अम्मा गुजर गई, पर उनकी हिदायत हमारी आदत बन गई। कभी पंखा चलाने की ओर ध्यान ही नहीं गया।
            कुछ दिन पहले बेटे रोहन के दोस्त आए। दोस्तों को हॉल में बिठाकर रोहन मेरे पास आया। तब तक उसके दोस्त ने पंखा चला ही लिया। हुआ वही जिसका हमेशा डर रहता है। एक चिड़िया घायल हो गई। मैंने तुरंत चिड़िया को हथेली पर लिया, पंख पर चोट थी। मैंने मरहम लगाया। चिड़िया की चूं-चूं में घुला करुण क्रंदन मुझे बैचेन कर रहा था। बाहर भी कुछ चिड़िया ज्यादा चहचहाने लगी थी। परिवार के सदस्य की व्यथा वे जाहिर कर रही थी। संवेदना और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए भाषा की जरूरत नहीं होती। मैंने तुरंत पंखे के बटन पर काले रंग के टेप की कई परत लगा दी। अफसोस रहा- यह काम पहले क्यों नहीं कर दिया! मैंने कमरे के एक कोने में एक प्याले में कुछ दाने रख दिए और एक प्याले में पानी। चिड़िया पूरे घर में फुदकती रहती। आने जाने वालों के पदचापों के आहट से वह घर के कोने में हो जाती। उड़ान भरने की कोशिश करती पर असफल रहती। पर इसकी कोशिश मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देती। मैं कहती- ' वीरा, तुम जल्द ही सफल हो जाओगी और तुम्हे खुला आसमां मिलेगा।' दिन रात मेरी निगाह उस वीरा पर रहती।
          कल सुबह नाश्ता करते वक्त राजेश मुस्कराते हुए बोले- "रोहन, आजकल तुम्हारी मम्मी को दिन भर का एक साथी मिल गया है। इनका अच्छा टाइम पास हो जाता है।"
"पापा, कौन?"
"अरे, यही परकटी चिड़िया! "
"पापा गलती हमारी ही थी। मम्मी ने तो इसे जीवन दान दिया है, वरना हमारे घर में एक हत्या हो गई होती! "
 राजेश की मुस्कराहट मुझे बड़ी बुरी लगी। राजेश के शब्द बड़े जहरीले लगे- 'टाइम पास' 'परकटी चिड़िया'। मेरे जख्म हरे हो गए। शादी से पूर्व मैं स्कूल में टीचर थी। शादी के बाद नौकरी की इजाजत नहीं मिली। बड़ी मान मुन्नवत की- 'घर में ही कुछ ट्यूशन ले लूं?' राजेश का जवाब था- 'टाइम पास करने के और भी तरीके हैं।' समझ गई- राजेश को ट्यूशन करना भी पसंद नहीं। रोहन का जन्म हुआ। अम्मा, बाबूजी, रोहन के बीच दिन बीतते गए, वर्ष बीतते गए। रोहन बड़ा हो गया। अम्मा, बाबूजी गुजर गए। कई बार नौकरी के प्रस्ताव आए, पर मानवीय संवेदनाओं से राजेश का दूर तक लेना देना नहीं था। यथार्थ के कठोर धरातल पर मेरे सपने दम तोड़ने लगे थे। ये घाव जिस्म के नहीं, दिल के थे। नासूर बन चुके थे।
            अब वीरा के पंख के घाव काफी भर गए । यह छोटी उड़ान भर कर पलंग, टेबल पर फुदकने लगी। इसकी बढ़ती उड़ान मेरी मुस्कराहट बढ़ा देती। मुझे वीरा से लगाव हो गया। आज तो यह खिड़की पर बैठ गई। पहले बाहर की ओर देखती रही, फिर फुदक कर घर के भीतर की ओर मुंह करके बैठ गई। मैंने अपना हाथ हिलाया- 'तुम जा रही हो, और आसमां में, अपना ध्यान रखना।' मैं बहुत खुश हूं। मेरा प्रयास सार्थक रहा। वह मुझे देख रही है, मानो मुझे कह रही है- ' तुम भी वीरा हो, विवश नहीं हो। परिवार के कर्तव्यों के साथ तुम्हारा अपने प्रति भी कुछ कर्तव्य है।'
            कुछ ही पल में वीरा स्वतंत्र विचरण से नभ की ऊंचाइयां छूने लगी। उसकी चहचहाहट मेरे कानों में गूंज रही थी- 'तुम अपने हिस्से का और आसमां कब खोजोगी?'
            कुछ ही दिन पहले आए स्कूल की नौकरी के प्रस्ताव को आखिर मैंने स्वीकार कर लिया।

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