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शब्द

जेहन में घूम रहे भावों के चक्रव्यूह, 
शब्द ढूंढती हूँ-अभिव्यक्त करने को।
जज्बातों को कागज पर उतार,
बुहार लेना चाहती हूं, मन का आँगन।

अहसासों की गठरी दिल से लगा,
अल्फाजों में सारे जज्बात उकेर दूँ।
भीतर मचल रहे उम्मीद, ख्वाब, अरमान,
यथेष्ट लफ्जों में बांध पा जाऊं निजात।

मेरे ही शब्द मुझे जगह दिलाते,
अतिरेक हो कभी हँसाते, कभी रुलाते।
शब्दों के उबाल से उठता विवादों का धुआं,
शब्दों की ध्वनि से रिश्ते बनते।

अंतर्मन में जज्बात निःशब्द हों,
तो मौन भी एक भाषा है।
मेरी कलम मिथ्यालाप नहीं करती,
 शब्दों से अक्स तो अपना ही दिखता है।

ए दिल, ए मुख, जरा संभल, 
निकले शब्द न लौटेंगे फिर।
संभल संभल कर निकल,
चुभते शब्दों को तू कर ले हजम।

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