मुझे नागपुर में रहते हुए 20 वर्ष हो गए हैं, तब बच्चे छोटे थे। अब सब की पढ़ाई हो गई, शादी हो गई। यह घर और घर के आसपास के लोग, यह सोसाइटी मुझे बड़ी प्यारी लगती है। इसने हमें बहुत कुछ दिया- मीठी यादें, कड़वे अनुभव, संघर्ष पूर्ण जीवन और अधिक मुसीबतों को झेलने का हौसला..। मेरी हम उम्र बहनों से तो मानो लगाव हो गया है। स्मिता बहन, नीलिमा भाभी, संगीता भाभी, जया भाभी, देनिका भाभी- ये सब अपने परिवार की सी लगने लगी हैं। हम सब अपनी समस्याओं को आपस में ही चर्चा कर सुलझाने का प्रयास करती हैं।
काफी दिन हो गए थे, हम सब साथ बैठ कर गप नहीं मार पाए थे। तय हुआ-- शाम चार बजे सभी मेरे घर आ जाएंगी। साथ में चाय पिएंगे। सभी समय पर आ गई, मानो चार बजने का ही इन्तजार कर रही हों ! कोई टिफिन में पकौड़ी, चटनी ले आई, कोई मठरी, तो कोई ढोकला। लो जी, घर में चाट की टेबल सज गई। खा पी लेने के बाद देनिका भाभी ने अपने पर्स में से एक डब्बा निकाला। मेरी बहू को बुला कर बोली- "तुम्हारे अंकल मेरे लिए स्मार्ट फोन लाए है, तुम मुझे इसे चलाना सीखा दोगी क्या?"
"हाँ, हाँ, आंटी क्यों नहीं !"
मुझे कुछ अजीब लगा। मैंने कहा- "पर तुम्हारा बेटा तो बड़ा है, उस से क्यों नहीं सीखती ?"
"अरे भाभी, मैंने तो उसी से कही थी। मेरा मजाक उड़ान लगा। बोला- मेरे से मोबाइल बदल लो, इसे सीखना आपके बस का ना है। अब तो मुझे इसका पूरा उपयोग सीखना है।"
देनिका भाभी के जोश और ललक को देख कर हम बहुत खुश हुए।
संगीता भाभी- "आजकल बच्चे कुछ भी बोलने में संकोच नहीं करते। कल मेरा बेटा मुझ से कह रहा था- आप मोबाइल पर बहुत देर बात करती हो, मैं पापा से शिकायत करूंगा।"
नीलिमा भाभी- "आजकल बच्चों की टोका टाकी बहुत बढ़ गई है। हमारे कपड़े, हमारे खाने पीने पर उनकी रोक टोक बनी रहती है।"
जया भाभी बड़ी शांति से बोली- "क्या खाएं, कैसी दिखें, किस से कितनी बात करें-इसके पहरेदार हर पीढ़ी में मिल जाते हैं। हल आक्रोश जताने में नहीं है। माना कि बच्चों का हमें टोकना उचित नहीं। इस गलती का अहसास उन्हें जरूर कराओ। बड़ों को इज्जत देना जरूरी है- यह जताना चाहिए। हमारे बच्चे हैं, हमारा पूरा हक है।" मुझे अपने दृष्टिकोण से जया भाभी की बात बहुत सही लगी। अचानक हम सभी को याद आई -स्मिता बहन -एक महीने से अपने भाई के पास गई हुई हैं। मैं बोली- "आज स्मिता बहन को हम मिस कर रहे हैं।" हमारी महफ़िल खत्म हुई। सब सहेलियां अपने अपने घर चली गई। देनिका भाभी अपने नए मोबाइल को लेकर बहू के साथ बैठ गई।
मुझे याद आ गई स्मिता बहन की। तीन वर्ष पूर्व वे अपने माता पिता के पास आ गई थी। उनके पति का देहांत हो गया था। कोई औलाद हुई नहीं। उम्र रही होगी- 45 वर्ष। जिंदगी भर हाथ थामने वाले का दुनिया से चले जाना- सदा के लिए अधूरापन देने वाला हादसा होता है। इस पीड़ादायी दौर में भी सब आपका साथ देने वाले हों, यह कतई जरूरी नहीं। इनके सास ससुर थे नहीं। जीवन साथी क्या गया, रेत की तरह सब रिश्ते छूटते चले गए। इनके बड़े भाई ने माता पिता के पास रहने के लिए बुला लिया। ये बच्चों को पढ़ाने लगी। दो वर्षों में माता पिता भी गुजर गए, ये अकेली रह गईं। एक दिन वे मुझसे बोली थी- "भाभी, घर में अकेले और टिक टिक करती घड़ी की सुइयां....जीवनक्रम एक पैटर्न बन गया है। जब ठहरा हुआ जल भी सड़ने लगता है, तो मनुष्य की बात क्या ? ठहराव और उकताहट को दूर करने के लिए बदलाव की जरूरत होती है। पर यह इतना आसान भी नहीं।" और उन्होंने एक लंबी साँस ली थी। मैं उनकी पीड़ा को समझ रही थी। दिन ढलने को है। देनिका भाभी जा चुकी थी। हम दोनों रसोई में लग गए।
करीब 5 दिन बाद स्मिता बहन का फोन आया-' भाभी, मैं आ गई हूँ। आज शाम को 4 बजे मेरे यहाँ आइए। मैंने सभो को फोन कर दिया है, साथ बैठ कर चाय पिएंगे। समय पर हम उनके घर पहुंच गए। उनका बदला हुआ रूप देखकर हम काफी अचंभित हुए -मांग में सिंदूर, चेहरे पर लालिमा, हाथों में घनी चूड़ियां। चेहरे पर मुस्कान यूं ही नहीं खिलती, जब दिल हंसता है, तो उम्र ठहर सी जाती है। कहा जाय- वे बड़ी सुंदर लग रही थी। वे खुद बोल पड़ी - "हाँ, मैंने शादी कर ली है। मेरे भाई ने मुझे बुलाया था। संजीव मेरे भाई के दोस्त हैं। इनकी पत्नी का दो वर्ष पूर्व निधन हो गया। हमारी शादी से पहले मैंने भैया से कहा -' लोग क्या कहेंगे?' उनका कहना है- कौन लोग? तुम परेशानी में थी, तुम्हारे पास कौन लोग आए? हम क्यों दूसरों के हिसाब से जिंदगी जिएं?"
जया भाभी- "स्मिता बहन, आपके भाई ने बिल्कुल सही कहा। हमें प्रसन्नचित्त जीवन जीना चाहिए। हमें अपनी खुशियों पर ध्यान देना चाहिए, न कि लोगों के कहने पर।"
स्मिता- "हम दोनों यहीं रहेंगे। ससुराल इसी शहर में है। ससुराल के लोग बहुत खुले विचारों के और व्यवहारिक हैं। संजीव की एक बेटी है। उसकी शादी हो गई है। स्मिता बहन के जीवन में आई खुशी से हम सभी खुश हुए। सभी ने उन्हें तहे दिल से बधाई दी।
मुझे टी वी का एक विज्ञापन याद आ गया। एक बुजुर्ग महिला ने जिंदगी की कमान संभाली और साथी तलाशने का फैसला लिया। कहानी उनकी रुकावटों और सामाजिक धारणाओं के डर के अनुभव बताती है और फिर हमें उनकी जिंदगी का महत्त्वपूर्ण पल देखने को मिलता है। जहाँ वे आशा और आत्मविश्वास के साथ अपने नए साथी का परिचय अपने बच्चों से कराती है। स्मिता बहन का घर पुनः बसा कर उनके बड़े भाई ने बहुत बड़ा फर्ज निभाया, उनका दृष्टिकोण तारीफ-ए-काबिल है।
दिन बीतते चले गए। एक दिन हम मियां बीबी स्मिता बहन के घर गए। संजीव जी से हमारा परिचय हुआ, बहुत अच्छा लगा। मुझे अच्छी तरह याद है- सोमवार दोपहर के समय.. स्मिता बहन हमारे घर आई। उनका आना अच्छा लगा, पर थोड़ी विस्मित भी हुई, वे बेवजह, बेसमय कहीं आती जाती नहीं। थोड़ी देर बाद बोली- "भाभी, मन थोड़ा उदास था, इसलिए आपके पास आ गई।" "अरे , आप हमारी स्मिता बहन हो, कभी भी आ सकती हो, मुझे बुला लेती ! क्या बात हुई?"
" भाभी, कल मेरे पहले ससुराल के जेठ जेठानी आए थे। उस समय संजीव घर पर ही थे। मेरे पुनर्विवाह पर उन्होंने बवाल मचा दिया। जेठजी कहने लगे- "विवाह करने से पहले हम से पूछ तो लेती, हम समाज में रहते हैं, इज्जत बनाकर रखनी पड़ती है।" बाद में वे तीखी मुस्कान के साथ बोले - शादी का न्यौता मिल जाता तो हम भी खुशी में शामिल हो जाते, मिठाई खा लेते। भाभी, जब बात चुभते शब्दों के साथ कही जाती है, तो दुःख होता है। "
"स्मिता बहन, संजीव जी कुछ नहीं बोले? "
" अरे, भाभी, वे तो बहुत गुस्सा हो गए। बोले- "आप इसके जेठ- जेठानी थे, कभी इस रिश्ते की जिम्मेदारी निभाई क्या? यहाँ स्मिता किस स्थिति में है, कैसी है- कभी आपने यह जानने की कोशिश की क्या ? आज इसके खुशहाल जीवन पर सवाल उठाने आ गए।। दवा की मियाद की तरह धैर्य की भी मियाद होती है। हालात इंसान के बस में नही, लेकिन जुबान और व्यवहार इंसान के बस में है। मैं आपको सम्मान दे रहा हूँ, शालीनता से कहूंगा- आज के बाद हमारे जीवन में दखल न दें।" भाभी, वे तुरंत चले गए।
"अरे, यह तो बहुत अच्छा हुआ- आपको एक शब्द भी न बोलना पड़ा। उन्होंने दूरी बना ली थी, अब सदा ही दूरी बनी रहेगी।"
हम भीतर की सांकल खोलना चाहते हैं , पर हमने कुरीतियों की जंजीर से खुद को बांध रखा है । आधुनिकता कोई विद्रोह नहीं, यह एक दृष्टिकोण है। जीवन के हर मोड़ पर जीवन साथी का साथ हो तो जीवन सफर खुशहाल बन जाता है।
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