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संचय

            मैं मध्यम वर्गीय परिवार का एक साधारण इंसान। मुझे बचपन से ही जरूरत से ज्यादा 'संचय' पसन्द नहीं। खर्च के मामले में मैंने हमेशा जरूरी सामानों को ऊंची फेहरिस्त में रखा। मेरी पत्नी का स्वभाव मुझ से विपरीत तो नहीं कहा जाएगा, पर हाँ, बिल्कुल अलग है। वह आधुनिक विचारों की है। जिसे मैं 'संचय' कहता हूँ,  वह स्टेटस को बनाए रखने के लिए उन्हें इकट्ठा करना जरूरी समझती है।
            काफी दिनों से मैंने कपड़े नहीं खरीदे थे। पत्नी के वाक्य से मैं मुस्करा दिया- " तुम्हारे पास गिनी चुनी शर्ट हैं, जिन के कारण तुम्हें लोग पीछे से ही पहचान जाते हैं। तुम इन कपड़ों से बोर नहीं हुए क्या? कल हम बाजार जाएंगे और आपके लिए 4-5 शर्ट खरीदेंगे।" बड़ी मान मुन्नवत के बाद मैं बाजार जाने को राजी हुआ, पर मैंने अपनी भी एक शर्त रख दी- "सिर्फ तीन शर्ट खरीदूंगा। वे भी ज्यादा महंगी नहीं होनी चाहिए।" मैंने पत्नी की पसंद के रंग और अपनी पसंद के दाम की तीन शर्ट खरीद लीं। दुकान से बाहर निकले, अंधेरा होने को था। जोरों की हवा चल रही थी, ठंड लगने लगी। हम कार में बैठे, कार के कांच बंद ही कर लिए। घर की ओर निकल लिए। सिग्नल पर कार रोकी। एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति कटोरा लिए मेरी खिड़की के पास आया। उसने फटी हुई बनियान और ऊँची धोती पहन रखी थी। उसके हाथ लगातार कांप रहे थे। मेरे मुँह से ' उफ्फ' निकला। उसे कुछ देने के लिए मैं सोचता, इस से पूर्व बत्ती हरी हो गई। मैंने आगे जाकर एक किनारे पर कार रोकी। पीछे की सीट पर रखे पैकेट में से एक शर्ट निकाली और कार से बाहर आया। श्रीमतीजी चिल्लाने लगी " यह शर्ट कहाँ ले जा रहे हो? अभी तो आपने पहनी भी नहीं है! अरे, वह बूढ़ा क्या नई शर्ट पहनेगा? इसे बेचेगा और शराब पिएगा।" पर मेरा मन नहीं माना। मैं सड़क पार कर के उस बूढ़े भिखारी को शर्ट दे ही आया। घर पहुंचने तक कार में सन्नाटा ही रहा। घर में भी थोड़ी नाराज़गी और उदासी से हमारे बीच तनाव रहा।
            दो-तीन दिन बाद उसी रास्ते से निकलना हुआ, पत्नी साथ थी, वह शर्ट भूली नहीं थी। उसी सिग्नल पर आते ही उसकी निगाहें उस बूढ़े को तलाशने लगी। चिल्लाई- "रोको, रोको, गाड़ी आगे रोको। देखो, वह बूढ़ा अपनी फ़टी बनियान में ही है। मैं ना कहती थी..." । गाड़ी आगे जा कर रुकी, तब तक तो श्रीमती जी के उद्गार मुझ पर तीर की तरह चलते रहे। हम उस बूढ़े के पास गए। मैंने पूछा- "बाबा, मैं आपको शर्ट दे कर गया था, फिर भी आप अपनी फटी बनियान में हो, वह...." मेरी बात को काट कर श्रीमतीजी बिफर पड़ी- "कितने में बेची?" बूढ़े की आँखों से आँसू बहने लगे। हम दोनों के आगे हाथ जोड़ कर दयनीय स्थिति में खड़ा हो गया, बोला - " साब, मैंने जिंदगी में कभी शराब नहीं पी, जुआ नहीं खेला। बस, तकदीर का मारा हूँ। आप मेरे साथ आइए।" हम दोनों उसके पीछे हो लिए। हमने देखा, एक प्रौढ़ महिला वह शर्ट पहनी हुई थी। वह बोला - " इसे गैंग्रीन हो गया है। गरीबी तकलीफों को बढ़ाती ही है। एक फोड़ा हुआ था, इलाज नहीं हो पाया, पंजा काटना पड़ा। साब, गरीबी भी तो गैंग्रीन ही है। इसके कपड़े जगह जगह से फटे हुए थे। आते जाते लोगों की गंदी निगाहें मेरी नजरें झुका देती थी। तन ढका रहे तो इज्जत बनी रहती है। इसलिए मैंने शर्ट इसे दे दी।"
            अब तो मेरी पत्नी की भी आंखों में आँसू आ गए। बोली - "चलो, घर चलते है। हम और कपड़े ले आएंगे, देने के लिए। प्रभु, तेरा बहुत बहुत धन्यवाद। तूने हमें देने वालों की श्रेणी में रखा है।"
मैं बोला- "हम देने वाले कौन हैं? हम तो निमित्त मात्र हैं। और फिर जरूरत से ज्यादा 'संचय' ही क्यों?"

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