दो कमरों का छोटा सा घर और बीच में एक ईंट की पतली दीवार। एक कमरे में मम्मी- पापा और दूसरे कमरे में स्वाति और दादी। स्वाति ने दादी को कभी काम करते हुए नहीं देखा, पर उनकी हुकूमत सदा कायम रही। मम्मी हर काम के लिए, हर व्यक्ति के लिए हमेशा तैनात रहती। पापा को गुस्सा बहुत जल्दी ही आता था। उस दिन पापा के चिल्लाने की आवाज से स्वाति डर गई। पापा दहाड़ रहे थे- " मेरे घर में रहना है, तो मेरे तरीके से रहो, वरना निकल जाओ यहाँ से।" दादी ने तो मुँह तक चादर ढक कर सोने का स्वांग रच लिया था। छह वर्षीया स्वाति अपने कमरे में दीवार से चिपक कर खड़ी हो गई-' इतनी रात को मम्मी कहाँ जाएंगी? मैं उनके बिना कैसे रहूँगी? क्या पापा मुझे और दादी को अकेले संभाल लेंगे!' एक कड़ी की तरह कई प्रश्न दिमाग में उठते गए। स्वाति परदे की आड़ में झांकती रही। होंठों को भींचे, गम को पीती हुई मम्मी खाना खा रही थी। एक एक निवाला धीरे धीरे उनके हलक से उतर रहा था। थोड़ी देर में कमरों की बत्ती बंद हो गई। स्वाति भी सो गई। सुबह आंख खुली, देखा- मम्मी रोज की तरह काम में लगी हैं। पापा ऑफिस चले गए, दादी मंदिर। स्वाति मम्मी से लिपट गई।
"मम्मी, आपका घर कहाँ है?"
"यही तो है मेरा घर।"
"नहीं, यह तो पापा का घर है। कल रात पापा कह रहे थे ना!"
" अरी पगली, वे आफिस के काम से थक जाते हैं, तो गुस्सा जल्दी आ जाता है, सो कह दिया।"
"पर आप भी तो थक जाती हो! यह आपका घर है, तो आप भी कह दो निकल जाओ मेरे घर से।"
"नहीं, नहीं, मैं नहीं कह सकती।"
कई वर्षों तक स्वाति का मन अशांत रहा, उसे उसके प्रश्नों का जवाब नहीं मिला था। मम्मी को सब्र के इम्तहान कई बार देने पड़े, पर वे निर्भीक नहीं बन पाई। इधर स्वाति का सुबोध भैया विदेश से पढ़ कर आ गया, नौकरी लग गई। उसकी शादी हो गई। पापा ने भाभी के लिए एक कमरा बनवा दिया। पढ़ी लिखी, नौकरी पेशा बहू आई, घर के काफी निर्णय उसके द्वारा लिए जाने लगे। जब तब मम्मी कुछ कहना चाहती, भैया और पापा उन्हें उनकी स्थिति का आभास करा देते। मम्मी सास तो बन गई, पर दादी से हुकूमत नहीं सीख पाई। सत्ता- हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। हालांकि घर की सत्ता मम्मी के हाथ में कभी थी ही नहीं, पर पहले कोई विकल्प नहीं था। मम्मी का दर्जा अब काफी कम हो गया था। वे मात्र एक 'कमेरी' औरत बन कर रह गई थी। स्वाति का अंतर्द्वद्व बढ़ता गया। पहले पिता, फिर पति, फिर बेटा.... माँ का अपना घर कहाँ है ?
स्वाति लेक्चरर बन चुकी थी। पापा ने देख परख कर राजन से स्वाति की शादी कर दी। पापा के घर में सदा परायापन रहा, इस घर को भी अपनाना सहज नहीं था क्योंकि यह घर राजन का था। घर में सास ससुर, दोनों ही बहुत प्यार करने वाले, नरम दिल, सुलझे विचारों के। स्वाति ने नौकरी नहीं छोड़ी। ससुराल का फ्लैट दूसरे मंजिल पर था। मकान में लिफ्ट नहीं थी। थोड़े दिन बाद सास- ससुर को सीढ़ियाँ चढ़ने में परेशानी होने लगी। चारों ने तय किया- इस फ्लैट को किराए पर निकाल देंगे। ग्राउंड फ्लोर पर ही एक बड़ा फ्लैट खरीद लिया जाय। किश्तों द्वारा बकाया रकम चुका देंगे।
स्वाति ने कहा- "आधी किश्त मैं चुकाऊंगी।"
सभी मुस्करा दिए। कुछ महीनों में नया घर सेट हो गया।
एक शाम स्वाति और सास साथ में चाय पी रहे थे।
सास ने कहा- "बेटा स्वाति, अब तुम नौकरी छोड़ दो। राजन अच्छा कमा लेता है, बाकी किश्त भी वही भर देगा।"
"नहीं , माँ, इस नए मकान में मैं पूरा सहयोग दूँगी, तभी तो बराबर की हिस्सेदार रहूँगी। मेरा अपना घर होगा।"
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