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अद्भुत संयोग

           आज घर में जोर शोर से तैयारी चल रही है। आज फिर रीमा को देखने लड़का आ रहा है। यह कोई पहली बार तो है नहीं। कई बार लड़के आए, देख गए। एक बार तो रिश्ता तय हो गया था, पर सच्चाई से परिचित कराते ही रिश्ता टूट गया। रीमा सोचती है- पहली मुलाकात में ही सत्य से अवगत करा दें, तो ऐसी नौबत ही न आए। उसका खुद का दृष्टिकोण स्पष्ट है। रीमा विवाह को अनिवार्य नहीं मानती है, पर माता-पिता मानते हैं, तो प्रयत्न जारी है। एक बार रीमा ने माँ से पूछा था- "आप लोगो ने मुझे एम ए, बी एड करा दिया। क्या विवाह करना जरूरी है?" 
माँ का जवाब था- "हर काम का एक वक्त और रिश्ते की एक जरूरत होती है। वह रिश्ता हमारी जिंदगी में न हो तो आज नहीं तो कल हमें इसकी कमी खलती ही है।"
बस इसके आगे बोलने की गुंजाइश ही नहीं थी। उनके कहे अनुसार प्रयास जारी है। रीमा ने भी सोच लिया है- वह अपनी एक कमी से हार नहीं मानेगी। आज रोहिणी जीजी भी आई हैं। उन्होंने अख़बार में विज्ञापन पढ़ा था- एक सुशील और गुणी वधू चाहिए। लड़का इकोनॉमिक्स में डॉक्टरेट है और यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। रोहिणी ने फोन पर पूछ लिया था- 'दहेज की मांग है क्या?' लड़के ने साफ इंकार कर दिया और कह दिया- 'मैं अकेला आऊँगा।'
           रोहिणी पूरे जतन से रीमा के साज श्रृंगार में जुटी हुई है। पर क्या लीपा पोती से असलियत छिप जाएगी? दरवाजे की घंटी बजी, धीमे कदमों से लड़के ने प्रवेश किया। बोला- "मैं श्रेयांश। मेरे माता पिता नहीं है, इसलिए मैं अकेला आया हूँ। कुछ वर्ष पूर्व एक कार दुर्घटना में वे गुजर गए। घर में और कोई है नहीं।"
          कुछ ही देर में रोहिणी रीमा को ले आई। श्रेयांश के बगल की कुर्सी पर बिठा दिया।। रोहिणी अपने पिता को अंदर ले गई। दोनों के बीच पढ़ाई सम्बंधित बातें हुईं। पांच मिनट बाद ही रोहिणी नाश्ता ले आई, बोली- "रीमा चाय ले आओ।" यह वाक्य इस मीटिंग के समापन का इशारा था। रीमा को श्रेयांश का व्यक्तित्व आकर्षित कर गया, जाते- जाते कनखियों से उसे देख लेना चाहा। रीमा चाय ले आई, रोहिणी ने उसके हाथ से चाय लेकर उसे भीतर जाने को कह दिया। थोड़ी देर बाद श्रेयांश बोला- "मुझे रिश्ता मंजूर है, आप को मेरे बारे में कोई तहकीकात करनी हो तो कर लीजिएगा। अपना निर्णय बता दीजिएगा।" रोहिणी और पिता एक साथ बोले- "हमें भी रिश्ता मंजूर है।" श्रेयांश चला गया। घर में सभी खुश हैं, पर रीमा खुश नहीं है। उसने पूछा- "दीदी, उन्हें सारी बात बता दी थी क्या?"
" नहीं रीमा, हमने उसके ऊपर ही छोड़ दिया कि स्वयं देख ले। वह नहीं देख सका, तो इसमें हमारा दोष नहीं।"
          रीमा कहना चाहती थी- आप लोग मुझे ज्यादा देर बैठने देते, तो उन्हें देखने का अवसर मिलता। रीमा को आत्मग्लानि हो रही है, अस्वीकृत होने के दुःख ने उसे इतना पीड़ित नहीं किया था। रात सभी सो गए, पर रीमा को नींद कहाँ?  उसने अखबार के विज्ञापन पर नजर डाली, श्रेयांश को फोन लगाया।
" श्रेयांश जी, मैं रीमा, आज सुबह आप हमारे घर आए थे।"
" हाँ, हाँ, बोलिए।"
" आपको मेरे पिता ने मेरे बारे में पूरी बात नहीं बताई।"
"क्या?"
"यही कि मेरी एक आंख नकली है। माता पिता ने सोचा- आप खुद देख लोगे। मेरा मन इस अन्याय के खिलाफ था, इसलिए आपको सूचित कर रही हूँ।"
" धन्यवाद, रीमा जी, मेरी भी बात सुनिए। मैं आपकी शिक्षा और सादगी को देखकर ही मुग्ध हो गया था- आपकी आंखों पर मेरा ध्यान नहीं गया। पर आज मैं आपके सामने बौना हो गया। मुझे समझ में नहीं आ रहा, मैं आपसे कैसे माफी माँगू? मैं चाहकर भी आप लोगों को नहीं बता सका- मेरे एक पैर में रॉड डली हुई है। मेरे माता पिता के एक्सीडेंट के समय मैं भी उनके साथ था- उसमें मेरे पैर की कई हड्डियाँ टूट गई। आप मुझे माफ़ करना। आप चाहो तो इस रिश्ते को इंकार कर सकती हो।"
 रीमा ने फोन रख दिया। अब उसका मन इस अद्भुत संयोग से बहुत खुश था। वह ऐसे ही निश्छल विवाहित जीवन की चाह रखती थी।

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