भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यान मग्न थे, आंख खोली तो शनि को अपने सामने पाया। शिवजी ने शनि के आने का कारण पूछा।
शनि बोले- " प्रभु, मैं आप पर आना चाहता हूं।"
भोले बाबा बोले-" अरे शनि , तू कहीं और चला जा, मुझ पर आकर क्या करेगा?
शनि- "मैंने भी ठान लिया है, मैं तो आऊंगा ही!"
महादेव- "क्यों जिद करता है? मैं तो वैसे भी औघड़ हूँ। मेरा क्या है! पार्वती को उसके मायके छोड़ आऊंगा। गणेश और कार्तिकेय भी अपने नाना नानी के यहां रह लेंगे। रहा नंदी, तो उसे किसी आश्रम में छोड़ दूंगा। मैं तपस्या में लीन रहूँगा। तू मुझ पर आ भी गया तो मुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा।"
मुस्कराते हुए शनि बोले- " प्रभु, आप कहते हो कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन असर तो पड़ चुका है।"
आशुतोष बोले- "वो कैसे ? मैं तो निश्चिंत हूँ।"
शनि- " महादेव, असर कैसे नहीं पड़ा ! अभी तो मैंने कहा ही है। अभी आया नहीं हूँ और आप अपने परिवार का बँटवारा करने लगे। सभी को इधर उधर करने लगे। खुद तपस्या के लिए तैयार हो गए। अब आपका यह हाल है, तो मनुष्यों का क्या होता होगा !"
शनि की बात सुन कर महादेव हँस पड़े।
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