Skip to main content

एक कथा- पढ़ी अच्छी लगी

भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यान मग्न थे, आंख खोली तो शनि को अपने सामने पाया। शिवजी ने शनि के आने का कारण पूछा। 
शनि बोले- " प्रभु, मैं आप पर आना चाहता हूं।"
भोले बाबा बोले-" अरे शनि , तू कहीं और चला जा, मुझ पर आकर क्या करेगा?
शनि- "मैंने भी ठान लिया है, मैं तो आऊंगा ही!"
महादेव- "क्यों जिद करता है? मैं तो वैसे भी औघड़ हूँ। मेरा क्या है! पार्वती को उसके मायके छोड़ आऊंगा। गणेश और कार्तिकेय भी अपने नाना नानी के यहां रह लेंगे। रहा नंदी, तो उसे किसी आश्रम में छोड़ दूंगा। मैं तपस्या में लीन रहूँगा। तू मुझ पर आ भी गया तो मुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा।"
मुस्कराते हुए शनि बोले- " प्रभु, आप कहते हो कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन असर तो पड़ चुका है।"
आशुतोष बोले- "वो कैसे ? मैं तो निश्चिंत हूँ।"
शनि- " महादेव, असर कैसे नहीं पड़ा ! अभी तो मैंने कहा ही है। अभी आया नहीं हूँ और आप अपने परिवार का बँटवारा करने लगे। सभी को इधर उधर करने लगे। खुद तपस्या के लिए तैयार हो गए। अब आपका यह हाल है, तो मनुष्यों का क्या होता होगा !"
शनि की बात सुन कर महादेव हँस पड़े।

Comments

Popular posts from this blog

अपनों के खोने का भय

                                                   आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे  एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |                                                    मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...

गर्मी ! गर्मी ! गर्मी !

         ये भीषण गर्मी ,          दिनोंदिन बढ़ती तपन ,          आग बरसाती ये सूरज की किरणें ,           पसीने से सराबोर इंसान ,           हर पल घूरता नभ को ,           कब बरसेगा पानी |

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...