आज घर में भूचाल आ गया है। सुबह ही सुशीला ने ऐलान कर दिया है- वह कॉलेज में दाखिला लेंगी। पति रमाकांत बोले-" तुम अपनी उम्र जानती हो ना! पचास वर्ष की हो गई हो। तुम्हारी उम्र बनारस, हरिद्वार जाने की है, न कि कॉलेज जाने की।"
"पढ़ाई के लिए भला कोई उम्र होती है, मैंने फैसला कर लिया है।"
"सुशीला, एक कहावत है- बूढ़े मुंह आए मुंहासे या सींग काटकर बछड़े में शामिल होना। तुम्हें शर्म नहीं आएगी।"
"अजी शर्म तो तब आई जब इंटर पास होते ही शादी कर दी गई तब 18 वर्ष की थी। तीन वर्षों में 2 बच्चों की माँ। अब 2 बच्चों की दादी, 2 बच्चों की नानी।"
बेटा- "माँ, आप कॉलेज जाओगी, तो घर कौन संभालेगा?"
सुशीला- "इस टप्पर को संभालने का ठेका मेरा ही है क्या? अपने बच्चे खुद पालो, यह भी कोई बात हुई!"
बहू- "माँ, क्यों न आप correspondance कोर्स से BA कर लो।"
"ना, बिल्कुल नहीं, मैं अपने सहपाठियों के साथ पढ़ना चाहती हूं। मैं अपनी सारी जिंदगी खुद को अलग अलग भूमिकाओं में फिट करती रही, लेकिन इन सब में मैं कहाँ हूँ? अब मैं अपने अस्तित्व की पहचान बनाना चाहती हूँ।"
बेटा- "माँ, आप घर के काम से परेशान हो तो हम आपकी जिम्मेदारी कुछ कम कर देते हैं। आप ज्यादा से ज्यादा आराम कर लिया करना।"
बहू- "माँ इतनी गुणी हैं मोहल्ले की औरतें, लड़कियाँ इनसे काफी कुछ सीख सकती हैं। घर में ही प्रशिक्षण स्कूल खुल सकता है, समाज सेवा भी हो जाएगी।"
पर सुशीला ने सारे प्रस्ताव नकार दिए। आखिरकार रमाकांत ने हाथ झाड़ दिए, बोले- "जाने दो। इस उम्र में रोज कॉलेज जाना इतना सहज है क्या? सुबह शाम बस के धक्के, क्लास में लगातार बैठे रहना- दो दिन में ही थक कर चूर हो जाएगी।" रमाकांत की निगाह और वाणी उपेक्षित भरी थी, पर सुशीला की जिद की सुई वहीं अटकी हुई थी।
दो वर्ष के लिए कॉलेज में एडमिशन ले लिया गया। घर में एक नए परिवर्तन ने जन्म ले लिया। पोते, पोती, बेटे के साथ एक टिफ़िन और लगने लगा। घर के संचालन की बागडोर बहू के हाथ में आ गई। सुशीला की बस न छुटे, इस बात का सभी ध्यान रखते। रमाकांत अपना काम खुद करने लगे।
क्लास में सुशीला को अपने अस्तित्व की पहचान अलग अलग रूप में हो रही थी, कुछ प्रोफेसर उनकी उम्र का लिहाज करके 'सुशीला जी' कहते, पर सहपाठी सुशीला कहने में संकोच नहीं करते। नई पीढ़ी के व्यवहार और संस्कृति को नजदीक से देखने का मौका मिला। आज चुस्त एवं अधखुले लिबासों को देखकर याद हो आए वो दिन- झोलेनुमा कपड़े पहनने पड़ते थे, जिससे शरीर का आकार ढका रहे। कैंटीन, प्ले ग्राउंड में लीन जोड़ो को देखकर वे क्षण भी याद हो आए, जब छत पर अकेले जाने की मनाही थी, बालकनी में खड़ा होना गलत माना जाता था। कुछ ही दिनों में सुशीला अपने सहपाठियों के बीच सलाहकार बन गई। साथियों के बीच नोंकझोंक हो या माता पिता से नाराजगी- सुशीला को सलाह देना अच्छा लगता।
उस दिन शीना बात बात पर झुंझला रही थी। सुशीला ने पूछ ही लिया- "शीना , आज तुम्हारी बोली में मिठास क्यों नहीं है?"
"हाँ, सुशीला, माँ- पिताजी के पास मेरे लिए एक अच्छा रिश्ता आया है। वे चाहते हैं मैं इसी वर्ष शादी कर लूं। आज मैं मेरे पेरेंट्स पर चिल्ला पड़ी और गुस्से में ही घर से निकल गई।"
"शीना, माता पिता हैं, तुम्हारा भला ही चाहेंगे, उन पर चिल्लाओ नहीं। कहना है तो ताकत अपने लफ्जों में डालो, आवाज में नहीं। अपनी बात को कायदे से पेश करो।" सभी सुशीला को एकटक देख रहे थे।
सुशीला के व्यवहार, बोलचाल में अंतर आने लगा। 'सब चलता है', 'फिकर नॉट'- जैसे जुमले जबान पर आने लगे। पढ़ाई के प्रति हमेशा सीरियस रही। यदि खेत में बीज न डालें तो कुदरत उसे घासपूस से भर देती है। इसी तरह दिमाग में सकारात्मक विचार न भरें तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं। एक दिन सौमित ने कह ही दिया- "तुमने इस उम्र में कॉलेज जॉइन किया है, एन्जॉय करो। इतनी सीरियस मत रहो। तुम्हें कौनसी नौकरी करनी है। हमें तो ज्ञान नहीं, परसेंट चाहिए, उसीसे अच्छी नौकरी मिलेगी।"
सुशीला- " सौमित, यार, नौकरी मिल भी गई, तो ज्ञान और काबिलियत के बिना करोगे क्या?"
" बॉस के मक्खन लगाएंगे।" सभी के ठहाके गूँज पड़े। सुशीला जानती है- आज की जनरेशन में संयम नहीं है। सभी कुछ इंस्टेंट चाहिए। इन्हें समझा सकती है, पर बहस करना व्यर्थ है।
परीक्षा पास आ रही है। कभी कभी पढ़ाई और घर के कामों के बीच संतुलन थोड़ा डगमगा जाता, पर सुशीला बड़ी चतुराई से तालमेल बिठा लेती। रात दिन परिश्रम किया, परीक्षा खत्म हुई। अब परिणाम का इंतजार है। इतने दिन से छूटे हुए और उपेक्षित सभी काम पूरे हुए। लो जी, रिजल्ट भी आ गया। 65 प्रतिशत परिणाम पाया। इस सफलता के लिए सुशीला को सभी की बधाईयाँ मिल रही हैं।
रमाकांत- "तुमने इन दो सालों में अपने अस्तित्व की क्या पहचान बनाई? रिश्तों द्वारा तो तुम्हारी पहचान थी ही।" सुशीला गंभीर हो गई, अपने पूरे परिवार को देखने लगी, बोली-" आप सब की मदद से जीवन के ये दो वर्ष अद्भुत रहे। मैंने स्वयं को खोजा, आज की संस्कृति के बीच। मैंने जाना- आत्मप्रगति के लिए आयु का कोई बंधन नहीं, आखिर मैं ग्रेजुएट हो गई। मेरे अस्तित्व में एक पहचान और जुड़ गई।"
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