हर एक लकीर दे रही पहचान,
जहां से गुजरी छोड़ गई निशान।
एक लकीर क्या खिंच गई,
हिस्सों में बांट कर चली गई।
काश, खिंचती लकीर जोड़ने के लिए,
पूरे जहान को समेटने के लिए।
कभी फुर्सत में हथेलियां तकती हूँ,
इन आड़ी तिरछी लकीरों को देखती हूँ।
क्या इन उलझी लकीरों में लिखी है किस्मत,
पर जिनके नहीं हैं हाथ, उनकी भी होती है ।
किस्मत।
पत्थर पर लकीर खिंच गई,
मानो मन के संकल्प को जता गई।
माथे पर पड़े बल बन गई लकीरें,
हाव-भाव दर्शाते ये सल, लकीरें।
हर लकीर बोल रही है एक जुबाँ,
चेहरे पर झुर्रियां जता रही तजुर्बा।
लकीरों का क्या? आकार, रूप बदल जाता है,
कर्म हर लकीर को बदल देता है।
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