Skip to main content

परफेक्ट मदर

           कल माँ जी (मेरी सास) के पास उनकी एक शुभचिंतक सहेली आई। बातों- बातों में कह गई- 'मेरी बहू से अपने बच्चे ना संभलते।' माँ जी ने कह दिया- 'तो तुम थोड़ा सहारा लगा दिया करो।' बात वही खत्म हो गई। अपने बच्चे ना संभलते- कहने का तातपर्य यही कि वह एक जिम्मेदार माँ नहीं है। क्या अपनों से सर्टिफिकेट की जरूरत है? किसे अधिकार है यह तय करने का कि फलां महिला अच्छी माँ है या नहीं।
           आज एक फ़िल्म देखी- 'मिसेस चटर्जी वर्सेज नॉर्वे'। यह एक सत्य घटना पर आधारित है। नॉर्वे में रह रहा भारतीय परिवार नॉर्वे के तौर तरीकों और कानून से अनभिज्ञ था। एक भारतीय माँ अपने बच्चे को गलती करने पर पिटती है- जिसे अत्याचार माना गया। दाल चावल चम्मच की बजाय हाथ से खिलाना पसन्द करती है- जिसे जबरन ठूंसने की उपमा दी गई। कई काम हैं, जिन्हें हर देश की माँ अपने बच्चे के साथ करती है। भारतीय संदर्भ में ये बातें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन नॉर्वे में यह कानून का उल्लंघन है, वहाँ चाइल्ड वेलफेयर सर्विस इन मातृ- दुलार का विरोध करती है और ऐसी माँ को अनपरफेक्ट मदर का सर्टिफिकेट देकर उसके दोनों बच्चों को अपने आश्रय में ले लेती है, जब तक कि बच्चे 18 वर्ष के नहीं हो जाते!
           आज इस फ़िल्म ने झकझोर दिया। एक माँ अपने बच्चे के लिए परफेक्ट नहीं है, यह बताने का अधिकार कैसे कोई ले सकता है? आखिर एक माँ पर परफेक्ट होने का दबाव क्यों डाला जाय? अपने बच्चे की इच्छाओं को, जरूरतों को जानने के लिए एक माँ कहीं से पढ़कर नहीं आती है। बच्चे की परवरिश कैसे की जाए- इसकी शिक्षा के लिए कोई इंस्टिट्यूट नहीं बने। ये दिल के तार हैं, जो जुड़े रहते हैं। भला माँ से उसके बच्चे को अलग किया जाएगा, तो वह शेरनी तो बनेंगे ही। फ़िल्म में अपने नुकसान की परवाह किए बिना वह हर परिस्थिति से लड़ जाती है- एक माँ की ममता के आगे देश को अपना कानून बदलना पड़ता है। तीन वर्षों की कानूनी जद्दोजहद के बाद वह माँ अपने दोनों बच्चों को पा लेती है।
           सच तो यही है कि हर माँ सिर्फ माँ होती है- परफेक्ट, अनपरफेक्ट नहीं।




Comments

Popular posts from this blog

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,       निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक       बजे थे छः उदित सुबह के ,       जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |       दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,       बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |       स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,       हुई यह छोटी सी गलती उससे      'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,      करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |      अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,      भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |      उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,      पर करा नीचे कुछ सोचकर |     चले गए वे यह बड़बड़ाकर -     'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|                                   मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,             ...