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असली श्रद्धांजलि

          जीवन वैसे ही चल रहा है। रोज के काम नियमित रूप से हो रहे हैं। कमी है तो पापा की। आज 2 तारीख को पापा का उठावना है, शाम को श्रद्धांजलि बैठक रखी गई है। मैं पापा के शौक कभी भूल नहीं सकता! सबेरे गाढ़े दूध की चाय पीना, अखबार किताबें पढ़ना, थोड़ी कसरत करना, नहा कर प्रेस के कपड़े पहनना और सोते समय एक गिलास दूध पीना। वे मुझे हमेशा कहा करते- 'कमाते हो, अच्छा खाओ, अच्छा पिओ, अच्छा पहनो, जीवन स्तर ऊँचा रहे, इसलिए शारीरिक- मानसिक कसरत करते रहो।' सुबह उठते ही मेरे हाथ में अखबार आया, तारीख पर ध्यान गया। मुँह से निकला- "निर्मला, बहुत बड़ी गलती हो गई। दूधवाले काका, प्रेस वाली अम्मा, अखबार वाले भैया को पिछले महीने के रुपये नहीं दिए। अभी तीनों के रुपए निकाल दो। उन्हें फोन करके बुला लेता हूँ।" पास खड़े चाचा जी सुन रहे थे, बोले- "अरे इसमें गलती कैसी? आज उठावना हो जाय फिर हिसाब कर देना।"
          "नहीं, चाचाजी। पापा इन तीनों की बहुत इज्जत करते थे। हम दोनों वर्किंग हैं, कई बार हम दोनों को बाहर जाना पड़ता था। गर्मी, सर्दी, बरसात कैसा भी समय रहा हो, ये तीनों नियमित रूप से आते रहे हैं। पापा इन्हें एक तारीख को ही रुपए दे दिया करते थे। कहते थे- गृहस्थी के खर्चे सभी के होते हैं, इन्हें समय पर रुपए देने चाहिए। हमारे कारण किसी के काम नहीं रुकने चाहिए, हमें अपने मन को समृद्ध बना कर रखना चाहिए। चाचाजी, मुझे उनकी बात को हमेशा फॉलो करना है, वही असली श्रद्धांजलि कहलाएगी।
        

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