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परछाई

राह में चलते ,
अपनी ही परछाई देख
मैं मुस्कराई,
एक नुक्कड़ से दुसरे नुक्कड़ तक,
मेरा आकार वही , कद वही ,
पर मेरा प्रतिबिम्ब ,
बदलता , सरकता , नाचता |
पढ़ा था , सुना था -
कभी -कभी  अपने साये से
भी लगता है डर |
नहीं , मैं डरी नहीं ,
मैं खुश हूँ-
एक स्थिर आकृति
अस्थिर प्रतिबिम्ब को देख |
सहसा मैं कांप उठी ,
मेरी ही छाया अदृश्य हो गई ,
मैं तो यहीं हूँ  ,
भला  ' वो ' कहाँ गई ?
उसे खोजने नज़र दौड़ाई ,
पीछे मुड़कर देखा-
एक विशाल आदमकद व्यक्ति की
विशाल छाया में ,
मेरी ही परछाई खो गई,
पल भर में मैं बौनी हो गई |

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