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कँवर साब सासरे जार फँस गा

रिश्तों हाल पक्को ही हुयो थो | कच्चा रिश्ता में जवाई जी सासरे गया | खातिरदारी तो होणी ही थी | घरां कोई  मोट्यार कोनी थो  | | सासूजी खूब आवभगत की | खाने को टेम थो - आसन बिछा दी , पाटे पर थाली रखी और खानो परोस दियो | जवाई  जी खानो खाने बैठगा | थाली में सब्जी, कढी, दही-बड़ा , चूरमो घणी चीजां थी | सासूजी  कने ही बैठगी- पंखों झेला लागी | जवाई जी ने कढ़ी कोनी भाती | सोच्यो पहले एने ही ख़तम कर दा और पी गो | सासूजी भोत राजी हुई ,सोची - ' कँवर जी ने कढ़ी भोत स्वाद लागी ,इलिए कटोरी रीति कर दी |' बा ओजू कढ़ी परोस दी | कँवर जी घबरा गा - तुरंत कटोरी मुंडे से लगाईं  और रीति कर दी | सासूजी भोत  राजी , फेर कटोरी भर दी | जवाई जी परेशान - फेर कढ़ी पी ली | पंखो हिलाता - हिलाता सासूजी  बोली -'' कँवर जी थे कित्ता भाई हो ? '' कँवर जी चक्कर तो खा ही रया था , परेशान हो कर बोल्या - ''जी , इब तक तो चार हां, पर इब थे कढ़ी परोस दोगा तो तीन ही रह जावेगा  !''

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चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,       निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक       बजे थे छः उदित सुबह के ,       जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |       दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,       बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |       स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,       हुई यह छोटी सी गलती उससे      'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,      करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |      अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,      भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |      उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,      पर करा नीचे कुछ सोचकर |     चले गए वे यह बड़बड़ाकर -     'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|                                   मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,             ...