रिश्तों हाल पक्को ही हुयो थो | कच्चा रिश्ता में जवाई जी सासरे गया | खातिरदारी तो होणी ही थी | घरां कोई मोट्यार कोनी थो | | सासूजी खूब आवभगत की | खाने को टेम थो - आसन बिछा दी , पाटे पर थाली रखी और खानो परोस दियो | जवाई जी खानो खाने बैठगा | थाली में सब्जी, कढी, दही-बड़ा , चूरमो घणी चीजां थी | सासूजी कने ही बैठगी- पंखों झेला लागी | जवाई जी ने कढ़ी कोनी भाती | सोच्यो पहले एने ही ख़तम कर दा और पी गो | सासूजी भोत राजी हुई ,सोची - ' कँवर जी ने कढ़ी भोत स्वाद लागी ,इलिए कटोरी रीति कर दी |' बा ओजू कढ़ी परोस दी | कँवर जी घबरा गा - तुरंत कटोरी मुंडे से लगाईं और रीति कर दी | सासूजी भोत राजी , फेर कटोरी भर दी | जवाई जी परेशान - फेर कढ़ी पी ली | पंखो हिलाता - हिलाता सासूजी बोली -'' कँवर जी थे कित्ता भाई हो ? '' कँवर जी चक्कर तो खा ही रया था , परेशान हो कर बोल्या - ''जी , इब तक तो चार हां, पर इब थे कढ़ी परोस दोगा तो तीन ही रह जावेगा !''
अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव मालूम पड़ गए | 1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...
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