रिश्तों हाल पक्को ही हुयो थो | कच्चा रिश्ता में जवाई जी सासरे गया | खातिरदारी तो होणी ही थी | घरां कोई मोट्यार कोनी थो | | सासूजी खूब आवभगत की | खाने को टेम थो - आसन बिछा दी , पाटे पर थाली रखी और खानो परोस दियो | जवाई जी खानो खाने बैठगा | थाली में सब्जी, कढी, दही-बड़ा , चूरमो घणी चीजां थी | सासूजी कने ही बैठगी- पंखों झेला लागी | जवाई जी ने कढ़ी कोनी भाती | सोच्यो पहले एने ही ख़तम कर दा और पी गो | सासूजी भोत राजी हुई ,सोची - ' कँवर जी ने कढ़ी भोत स्वाद लागी ,इलिए कटोरी रीति कर दी |' बा ओजू कढ़ी परोस दी | कँवर जी घबरा गा - तुरंत कटोरी मुंडे से लगाईं और रीति कर दी | सासूजी भोत राजी , फेर कटोरी भर दी | जवाई जी परेशान - फेर कढ़ी पी ली | पंखो हिलाता - हिलाता सासूजी बोली -'' कँवर जी थे कित्ता भाई हो ? '' कँवर जी चक्कर तो खा ही रया था , परेशान हो कर बोल्या - ''जी , इब तक तो चार हां, पर इब थे कढ़ी परोस दोगा तो तीन ही रह जावेगा !''
चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|' कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है | मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...
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