Skip to main content

ओम जय जगदीश हरे

ओम जय जगदीश हरे , ओम जय जगदीश हरे ,
प्रभु , तेरे द्वार रत्न भण्डार , तेरे घर बड़े हरे -भरे |
पद्मनाभ हो या वैष्णो देवी या हो तिरुपति ,
शिरडी हो या सिद्धी विनायक गणपति |
तहखानों में बरसती सम्पदा रिमझिम-रिमझिम ,
खुल जा सिम सिम , खुल जा सिम सिम |
प्रभु जग ने जाना भारत है सोने की चिड़िया ,
जानो , बूझो कितनी चमकीली, विराट है चिड़िया !
इस सोने की चिड़िया से क्या होगा देश का भला ?
क्या धन सम्पदा जरुरतमंदो को रहेगा फला ?
प्रभु , तूने बहुत कुछ दिया , तेरा तुझको अर्पण ,
पर जब तुझसे न संभले , कर मुझ को ही अर्पण |
जो प्रसाद चढ़ाते , मिल-जुट-बाँट खा लेते ,
कोई ऐसी राह बना , चढ़ावा न चढ़ जाये स्विस के खाते|
प्रभु , हर रूप में है तू नारायण ,
हाथ जोड़ खड़े हम दरिद्र- नारायण |
प्रभु , तू है पूर्ण , नहीं चाहिए तुझे कुछ ,
आशीष बनाए रखना , हम पा  जाए बहुत कुछ |

ओम जय जगदीश हरे , ओम जय जगदीश हरे |


Comments

Popular posts from this blog

अपनों के खोने का भय

                                                   आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे  एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |                                                    मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...

गर्मी ! गर्मी ! गर्मी !

         ये भीषण गर्मी ,          दिनोंदिन बढ़ती तपन ,          आग बरसाती ये सूरज की किरणें ,           पसीने से सराबोर इंसान ,           हर पल घूरता नभ को ,           कब बरसेगा पानी |

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...