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गिरगिट

                                        आप सभी जानते हो -'गिरगिट '| गिरगिट  रंग बदलता है | प्रायः अपने विचार बदलने वालों को गिरगिट की श्रेणी में रख कर लोग व्यंग कसते हैं | पर ऐसा क्यों ? क्या विचारों को बदलना  बुद्धि की अस्थिरता और नासमझी है?| मैं तो ऐसा नहीं मानती !
                                        हमारी जिन्दगी पानी के प्रवाह की तरह गतिमान है- इसे किस-किस परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इस पर कितने ही प्रभाव हावी हो जाते हैं | आज का लिया हुआ निर्णय शायद कल बदलना पड़े ! शायद सन्मुख खड़े तकाजे इन्हें मोड़ दे | गिरगिट को ही देख ले - वह अपने बचाव के लिए या भावों को व्यक्त करने के लिए रंग बदलता है |  जड़ बने रहना परिस्थिति के अनुकूल न ढलना - अपरिपक्वता होगी | समय के अनुसार अपनी चाल बदलें- सीधे चलते हो तो टेढ़े भी चल कर देखें -यही विद्वता की निशानी है |
                                         प्रवाह से पत्थर भी घिस जाते हैं | तपन से लोहा भी गल जाता है - जो कि जड़ हैं |  हम तो चैतन्य- जीव हैं | आज के समय में परिवर्तनशील  बने रह कर गतिमान रहने में ही समझदारी है| फिर वह गिरगिट  ही क्यों ना हो !

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मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ