आप सभी जानते हो -'गिरगिट '| गिरगिट रंग बदलता है | प्रायः अपने विचार बदलने वालों को गिरगिट की श्रेणी में रख कर लोग व्यंग कसते हैं | पर ऐसा क्यों ? क्या विचारों को बदलना बुद्धि की अस्थिरता और नासमझी है?| मैं तो ऐसा नहीं मानती !
हमारी जिन्दगी पानी के प्रवाह की तरह गतिमान है- इसे किस-किस परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इस पर कितने ही प्रभाव हावी हो जाते हैं | आज का लिया हुआ निर्णय शायद कल बदलना पड़े ! शायद सन्मुख खड़े तकाजे इन्हें मोड़ दे | गिरगिट को ही देख ले - वह अपने बचाव के लिए या भावों को व्यक्त करने के लिए रंग बदलता है | जड़ बने रहना परिस्थिति के अनुकूल न ढलना - अपरिपक्वता होगी | समय के अनुसार अपनी चाल बदलें- सीधे चलते हो तो टेढ़े भी चल कर देखें -यही विद्वता की निशानी है |
प्रवाह से पत्थर भी घिस जाते हैं | तपन से लोहा भी गल जाता है - जो कि जड़ हैं | हम तो चैतन्य- जीव हैं | आज के समय में परिवर्तनशील बने रह कर गतिमान रहने में ही समझदारी है| फिर वह गिरगिट ही क्यों ना हो !
हमारी जिन्दगी पानी के प्रवाह की तरह गतिमान है- इसे किस-किस परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इस पर कितने ही प्रभाव हावी हो जाते हैं | आज का लिया हुआ निर्णय शायद कल बदलना पड़े ! शायद सन्मुख खड़े तकाजे इन्हें मोड़ दे | गिरगिट को ही देख ले - वह अपने बचाव के लिए या भावों को व्यक्त करने के लिए रंग बदलता है | जड़ बने रहना परिस्थिति के अनुकूल न ढलना - अपरिपक्वता होगी | समय के अनुसार अपनी चाल बदलें- सीधे चलते हो तो टेढ़े भी चल कर देखें -यही विद्वता की निशानी है |
प्रवाह से पत्थर भी घिस जाते हैं | तपन से लोहा भी गल जाता है - जो कि जड़ हैं | हम तो चैतन्य- जीव हैं | आज के समय में परिवर्तनशील बने रह कर गतिमान रहने में ही समझदारी है| फिर वह गिरगिट ही क्यों ना हो !
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