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एक माँ की सीख

                                             
                                               " बच्चे स्कूल से आ गए क्या ?"  कमरे में से सुशीला ने आवाज दी | सास की आवाज से रमा की तन्द्रा भंग हुई | रमा डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठी है | बोली- " हाँ , माँ जी , बच्चे आ गए हैं | कपड़े बदल रहे हैं | आप आइये | खाना परोस रही हूँ | " सुशीला प्रायः अपने बड़े बेटे के पास रहती हैं | इन दिनों रमा सुरेश के पास आई हुई हैं | सुशीला ने घर में एक नियम बना दिया है कि यहाँ उनके रहते घर में उपस्थित सभी सदस्य एक साथ बैठ कर ही खाना खाएं | बच्चे जया और जतिन कुर्सी पर बैठ गए | रमा ने खाना परोसा -दाल  और भरवां भिन्डी , रोटी | जतिन को दोनों ही चीजें पसंद नहीं | थाली परोसते ही बिदक गया और जोर से थाली को धक्का दे कर चिल्लाया - " मम्मी , मैंने आपसे कितनी बार कहा है मुझे ये सब नहीं पसंद | मुझे आलू की सब्जी पसंद है | मुझे खाना नहीं खाना | आप मेरे लिए मैगी बना दो | " थाली को धकेलने से चारों तरफ दाल  बिखर गईं | यह नजारा देख सुशीला अचंभित हो गई | रमा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई क्योंकि वह खुद जतिन के बदलते रवैये से परेशान थी |

                                                         खाना खा लेने के बाद सुशीला बच्चों के कमरे में आ गई | आज जतिन के व्यवहार ने उन्हें विचलित कर दिया | जतिन अब छोटा नहीं रहा | 11 वर्ष का हो गया है | दोनों बच्चे पढाई करने बैठ गए | शाम को दोनों बच्चे अपनी दादी के साथ सांप - सीढ़ी जरुर खेलते | आज भी गेम शुरू हो गया | सांप और सीढ़ी के साथ गेम में उतार चढाव आ रहे हैं | हंसी ठहाके लग रहे हैं | जतिन का मूड भांप कर सुशीला ने बात छेड़ी - " जतिन तुम दाल क्यों नहीं खाते , भिन्डी क्यों नहीं खाते ? "
" दादी मुझे पसंद नहीं | "
" तो क्या हर समय आलू की सब्जी ही खाओगे और कब तक ? " तुम्हारी मम्मी इतनी मेहनत से स्वादिष्ट खाना बनाती है और तुमने एक झटके में खाना फ़ेंक दिया | यह तो अनाज का ही नहीं तुम्हारी मम्मी का भी निरादर हुआ | तुम ने सोचा - इस से मम्मी को कितना दुःख हुआ | तुम चाहते हो तुम्हारी मम्मी तुम्हारी पसंद का ध्यान रखे | पर तुमने कभी अपनी मम्मी की पसंद का ध्यान रखा है ? पहले तो तुम ऐसा नहीं करते थे ! "
" सॉरी दादी , आगे से ऐसा नहीं करुँगा | "
बस , कुछ दिनों में जतिन ने धीरे-धीरे सभी सब्जियां खानी शुरू कर दी |
                                                      आज शनिवार है | रमा और सुरेश बाजार चले गए | घर का सामान ले कर लौटे | घर में घुसते ही सुरेश ने अपने जूते उतारकर पटके और रमा भी सामान ले कर रसोई में चली गई | दोनों के क़दमों से सुशीला ने भांप लिया कि दोनों लड़ कर आए हैं |

                                                      रात का खाना बन कर तैयार हो गया तो रमा ने सभी को आवाज दी | पर यह क्या ? सुरेश तो घर में ही नहीं है - खाना खाने के समय ही बाहर चला गया | बच्चो के सामने कुछ कहना उचित नहीं होगा -यह सोच कर सुशीला चुप रही | सब ने खाना खा लिया | रात के 11 बज गए तब सुरेश घर में घुसा | रसोई में गया , पानी पिया और सो गया |

                                                       आज रविवार है -सभी सुबह आराम से उठे- बच्चों ने उठते से ही एलान कर दिया था कि शाम को हम दोनों को पड़ोस में अयान के जन्मदिन की पार्टी में जाना है | दिन भर घर का माहौल कुछ शांत और स्थिर ही रहा | दोपहर सभी ने साथ ही खाना खाया -पर दादी-पोता-पोती ही बतियाते रहे |

                                                   शाम को बच्चे अयान के जन्मदिन की पार्टी में चले गए - रमा तीनों के लिए चाय बना लाई | सुरेश चाय का कप  ले कर उठने लगा , तभी सुशीला ने उसे रोका - " हमारे साथ ही बैठ कर चाय पियो | " थोड़ी देर बाद वे बोली - " कल रात भोजन के समय तुम कहाँ थे ? जानती हूँ कल तुम दोनों के बीच किसी बात पर विवाद हुआ , यह तो हर मियां - बीबी के बीच होता है , पर इस तरह घर से निकल जाना उचित है ? यदि रमा भी इस तरह घर से निकल जाय तो परिणाम सोचा है ! ' मन चाहे एकला चलो रे ' की भावना ही गैरजिम्मेदाराना भाव को दर्शाती है | तुमने तो बाहर जा कर मूड ठीक कर लिया , पर रमा के लिये तो कोई विकल्प नहीं , उसे तो बच्चों के लिए खाना बनाना ही है , जिम्मेदारियों को निभाना ही है | सुरेश , रिश्तों को समझना और सहेजना बहुत जरुरी है | तुम दोनों को थोडा बर्दाश्त करना सीखना होगा - तभी अपने बच्चों को सकारात्मक माहौल दे सकोगे | सोच-संस्कार परवरिश से ही बनते हैं | तुमने घर से बाहर निकल कर अपना गुस्सा जाहिर कर दिया , तो जतिन ने अपनी थाली को धकेल कर गुस्सा जाहिर किया |

                                                        सुरेश की नजरें नीचे झुक गई |


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