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बाबूजी

                                               सीमा ने ऑफिस से आकर घर का ताला खोला , अन्दर एक लिफाफा पड़ा मिला | अरे , यह तो बाबूजी का पत्र है | ऊपर पते पर सीमा - सुनिल दोनों के ही नाम लिखे हैं | उनके हर पत्र पर दोनों का ही नाम लिखा होता है , जिससे पत्र व्यक्तिगत न लगे | पत्र खोला , लिखा था - ' मैं नौकरी से एक वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्ति ले रहा हूँ और तुम दोनों के साथ रहना चाहता हूँ | पहुँचने की तारीख तय होते ही सूचित करूँगा | '
                                                 सीमा को बीते दिनों की याद हो आई | दो वर्ष पूर्व सीमा मुंबई के इस घर में ब्याह कर आई थी | तब माँ - बाबूजी यहीं साथ में रहते थे | पर छः महीने बाद बाबूजी का ट्रांसफर नागपुर हो गया | इन छः महीनों में सीमा ने गौर किया था कि बाबूजी को घर के किसी काम में मदद करने की आदत नहीं थी या यूँ कहें माँ जी उन्हें काम करने का मौका ही नहीं देती थी | दोनों नागपुर चले गए | सीमा ने भी उनकी इजाजत से नौकरी ज्वाइन कर ली | थोड़े ही दिन बाद माँजी अस्वस्थ रहने लगी | गंभीर बिमारी का इलाज हो पाता , इस से पूर्व उनका देहान्त हो गया | साल भर से बाबूजी अकेले रह रहे हैं | कई बार सीमा , सुनील उनसे कह चुके हैं कि अब नौकरी छोड़ कर हमारे साथ रहो | पर बाबूजी का एक ही जवाब - ' जब तक शरीर में दम है , नौकरी करूँगा फिर तो तुम्हारे पास ही रहूँगा | '
                                                आज बाबूजी के पत्र से सीमा थोड़ी परेशान हुई , सोचने लगी - ' कामकाजी महिलायों की दुनिया नहीं बदली | उन्हें दोहरी जिम्मेदारियां निभानी ही पड़ती है | सुनील को जरा भी काम करने की आदत नहीं , बल्कि उनके फैले कामों को ही बटोरते- बटोरते झुंझला जाती हूँ | सुबह उठ कर घर की साफ सफाई , कपडे , बर्तन की सफाई , खाना बनाना - ऑफिस जाने तक एक टांग पर खड़े रहना पड़ता है | फिर बाबूजी आ जायेंगे तो सब काम अकेले कैसे कर पाएगी - कहीं उनकी सेवा में कोई कमी नहीं रह जाय | '


                                                                                                                               क्रमशः ..........


     

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