अगले सप्ताह बाबूजी का फ़ोन आया- ' मैं रविवार को मुंबई पहुँच रहा हूँ | ' रविवार सुबह बाबूजी आ गए | घर में काफी रौनक हो गई | पूरा दिन बाबूजी अपना सामान अपने कमरे में व्यवस्थित करने में लगे रहे | मदद के लिए बार-बार सुनील को बुलाते | रात खाना खाते वक्त सीमा बोली- " बाबूजी , मैं सुबह दस बजे दफ्तर जाती हूँ और शाम पांच बजे लौट आती हूँ | " बाबूजी समझ गए , बोले- " बेटा , मैं सुबह चाय नाश्ता तुम लोगों के साथ करूँगा , मेरे लिए खाना बना कर रख जाना - मैं दोपहर में खा लूँगा | शाम की चाय तुम्हारे साथ पीऊंगा | "
सोमवार- घड़ी की वही भागती सुइयाँ और अनगिनत काम | सीमा सुबह छः बजे से ही काम लगी हुई है | सुनील और बाबूजी को चाय पकड़ाई | दोनों ने अखबार पढ़ते-पढ़ते चाय पी | चाय पीने के बाद बाबूजी ने अपना और सुनील का कप उठाया और रसोई की मोहरी में धोकर रख आए |सुनील अखबार में मसरूफ था , पर कनखियों से बाबूजी को कप ले जाते देख लिया था- उसे बहुत आत्मग्लानि हुई | रसोई से बाहर आकर बाबूजी बोले - " सुनील , उठो जब पंखा बंद कर देना , वर्ना अखबार चारों तरफ फ़ैल जायेंगे | " सुनील समझ गया | उसने अखबार को कायदे से समेट कर टेबल पर रखे छोटे शोपीस से दबा दिया | घड़ी देखी - 8 बज रहे हैं | नहाने चला गया | नहा कर आया -बाबूजी से बातें करने लगा | बात करते-करते अपना गीला तौलिया सोफे पर ही छोड़ दिया और कमरे में चला गया | बाबूजी ने तौलिया सुखा दिया - फिर सुनील को अपनी गलती का अहसास हुआ | सीमा ने दोनों का नाश्ता परोस दिया | बाबूजी बोले -' बेटा सीमा , तुम नाश्ता नहीं करोगी ? ' सीमा बोली - ' बाबूजी , मैं नहाकर नाश्ता करुँगी | आप दोनों खाइए | ' नाश्ता कर लेने के बाद सुनील ही दोनों के बर्तन रसोई की मोहरी में रख आया | सीमा सुनील को अचरज भरी निगाहों से देख रही थी | सुनील टिफ़िन लेकर दफ्तर के लिए निकल गया | सीमा ने सारे काम निपटाए और दफ्तर के लिए निकल गई |
शाम पांच बजे लौटी -देखा बाबूजी बालकनी में बैठे हैं , सीमा को बहुत अच्छा लगा | वैसे भी सीमा को घर के ताला लगाना और ताला खोलना- कतई पसंद नहीं , इसमें एक अलग तरह की जिम्मेदारी का अहसास होता है | सीमा ने दोनों के लिए चाय बनाई और बाबूजी के पास ही बैठ गई | सीमा ने पूछा - "बाबूजी , आपका दिन कैसा बीता ? "
बाबूजी - " दिन तो अच्छा बीता | पर एक बात है बेटा , तुम्हें इतना काम करते देख अच्छा नहीं लगा | तुम घर की साफ़-सफाई के लिए एक महरी रख लो | पहले तुम दोनों के दफ्तर जाने के बाद महरी से काम कराना मुश्किल था | पर अब तो मैं घर पर ही रहता हूँ - महरी काम कर जायेगी , तुम्हें भी थोड़ी राहत मिलेगी | हाँ , रसोई में एक डायरी और पेन रख लो | घर की जरूरतों के सामन की लिस्ट बना लिया करना | मैं बाजार से ले आया करूँगा , इस तरह मेरा घूमना भी हो जायेगा | "
सीमा - " जी बाबूजी | "
दो- तीन दिन में बाबूजी ने घर का कायाकल्प ही बदल दिया | सुनील में अप्रत्याशित परिवर्तन आ गया | सबेरे उठते ही अपनी चादर समेटना , कमरे को व्यवस्थित करना , झूठे बर्तन मोहरी में रखना , गीला तौलिया सुखाना , जूते दरवाजे पर ही उतारना - सभी काम करने लगा | महरी के सुपुर्द घर की साफ- सफाई होने से सीमा भी दोनों के साथ चाय की चुस्की लेने लगी | शाम को दफ्तर से आने पर दूध , दाल , सब्जी सभी करीने से रखी मिलती | कई बार तो बाबूजी पालक , मेथी भी साफ करके रख देते |
सीमा सोचने लगी- " सहारे का यकीन जमीन से ज्यादा पुख्ता होता है | "
सोमवार- घड़ी की वही भागती सुइयाँ और अनगिनत काम | सीमा सुबह छः बजे से ही काम लगी हुई है | सुनील और बाबूजी को चाय पकड़ाई | दोनों ने अखबार पढ़ते-पढ़ते चाय पी | चाय पीने के बाद बाबूजी ने अपना और सुनील का कप उठाया और रसोई की मोहरी में धोकर रख आए |सुनील अखबार में मसरूफ था , पर कनखियों से बाबूजी को कप ले जाते देख लिया था- उसे बहुत आत्मग्लानि हुई | रसोई से बाहर आकर बाबूजी बोले - " सुनील , उठो जब पंखा बंद कर देना , वर्ना अखबार चारों तरफ फ़ैल जायेंगे | " सुनील समझ गया | उसने अखबार को कायदे से समेट कर टेबल पर रखे छोटे शोपीस से दबा दिया | घड़ी देखी - 8 बज रहे हैं | नहाने चला गया | नहा कर आया -बाबूजी से बातें करने लगा | बात करते-करते अपना गीला तौलिया सोफे पर ही छोड़ दिया और कमरे में चला गया | बाबूजी ने तौलिया सुखा दिया - फिर सुनील को अपनी गलती का अहसास हुआ | सीमा ने दोनों का नाश्ता परोस दिया | बाबूजी बोले -' बेटा सीमा , तुम नाश्ता नहीं करोगी ? ' सीमा बोली - ' बाबूजी , मैं नहाकर नाश्ता करुँगी | आप दोनों खाइए | ' नाश्ता कर लेने के बाद सुनील ही दोनों के बर्तन रसोई की मोहरी में रख आया | सीमा सुनील को अचरज भरी निगाहों से देख रही थी | सुनील टिफ़िन लेकर दफ्तर के लिए निकल गया | सीमा ने सारे काम निपटाए और दफ्तर के लिए निकल गई |
शाम पांच बजे लौटी -देखा बाबूजी बालकनी में बैठे हैं , सीमा को बहुत अच्छा लगा | वैसे भी सीमा को घर के ताला लगाना और ताला खोलना- कतई पसंद नहीं , इसमें एक अलग तरह की जिम्मेदारी का अहसास होता है | सीमा ने दोनों के लिए चाय बनाई और बाबूजी के पास ही बैठ गई | सीमा ने पूछा - "बाबूजी , आपका दिन कैसा बीता ? "
बाबूजी - " दिन तो अच्छा बीता | पर एक बात है बेटा , तुम्हें इतना काम करते देख अच्छा नहीं लगा | तुम घर की साफ़-सफाई के लिए एक महरी रख लो | पहले तुम दोनों के दफ्तर जाने के बाद महरी से काम कराना मुश्किल था | पर अब तो मैं घर पर ही रहता हूँ - महरी काम कर जायेगी , तुम्हें भी थोड़ी राहत मिलेगी | हाँ , रसोई में एक डायरी और पेन रख लो | घर की जरूरतों के सामन की लिस्ट बना लिया करना | मैं बाजार से ले आया करूँगा , इस तरह मेरा घूमना भी हो जायेगा | "
सीमा - " जी बाबूजी | "
दो- तीन दिन में बाबूजी ने घर का कायाकल्प ही बदल दिया | सुनील में अप्रत्याशित परिवर्तन आ गया | सबेरे उठते ही अपनी चादर समेटना , कमरे को व्यवस्थित करना , झूठे बर्तन मोहरी में रखना , गीला तौलिया सुखाना , जूते दरवाजे पर ही उतारना - सभी काम करने लगा | महरी के सुपुर्द घर की साफ- सफाई होने से सीमा भी दोनों के साथ चाय की चुस्की लेने लगी | शाम को दफ्तर से आने पर दूध , दाल , सब्जी सभी करीने से रखी मिलती | कई बार तो बाबूजी पालक , मेथी भी साफ करके रख देते |
सीमा सोचने लगी- " सहारे का यकीन जमीन से ज्यादा पुख्ता होता है | "
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