बंधे हाथों पर टिकी है ठोढ़ी,
मुग्ध हूँ , ख्यालों में थोड़ी-थोड़ी |
मन अस्थिर है पर विचलित नहीं ,
खोने का कोई अवसाद नहीं|
स्मृति की मंजूषा में मोती अनेक,
अनमोल हैं , तराशे गए नेक |
उपकार प्रभु का , मानव जीवन पाया ,
जीवन में है बहुत कुछ पाया |
क्या कहूँ , शब्दों ने नहीं सीखा ,
मानो गूंगे के लिए गुड़ सरीखा
उंगली पकड़ जिन्हें चलना सिखाया ,
आज मेरे बच्चों ने ही हौसला बढ़ाया |
आज उम्र मेरी साठ हो गई ,
लो , मैं बड़ी ,बहुत बड़ी हो गई |
सुर्ख काया कुछ मटैली हो गई ,
चनचनाती धूप कुछ मद्धिम हो गई
पर उमगती है उमंगों की लहरें ,
कौन जाने , कब ये ठहरे !\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\
हर स्पंदन पर बढ़ती एक चाहत ,
कुछ देर बैठ , लूँ अब राहत |
रिश्तों की उधड़ी बखिया सी लूँ ,
अपनी अधूरी इच्छाओं को फिर जी लूँ !
नहीं कभी कोई इच्छा महान बनूँ ,
बस फर्ज निभा एक इंसान बनूँ |
मुग्ध हूँ , ख्यालों में थोड़ी-थोड़ी |
मन अस्थिर है पर विचलित नहीं ,
खोने का कोई अवसाद नहीं|
स्मृति की मंजूषा में मोती अनेक,
अनमोल हैं , तराशे गए नेक |
उपकार प्रभु का , मानव जीवन पाया ,
जीवन में है बहुत कुछ पाया |
क्या कहूँ , शब्दों ने नहीं सीखा ,
मानो गूंगे के लिए गुड़ सरीखा
उंगली पकड़ जिन्हें चलना सिखाया ,
आज मेरे बच्चों ने ही हौसला बढ़ाया |
आज उम्र मेरी साठ हो गई ,
लो , मैं बड़ी ,बहुत बड़ी हो गई |
सुर्ख काया कुछ मटैली हो गई ,
चनचनाती धूप कुछ मद्धिम हो गई
पर उमगती है उमंगों की लहरें ,
कौन जाने , कब ये ठहरे !\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\
हर स्पंदन पर बढ़ती एक चाहत ,
कुछ देर बैठ , लूँ अब राहत |
रिश्तों की उधड़ी बखिया सी लूँ ,
अपनी अधूरी इच्छाओं को फिर जी लूँ !
नहीं कभी कोई इच्छा महान बनूँ ,
बस फर्ज निभा एक इंसान बनूँ |
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