दो दिन पूर्व हमने ' महिला दिवस ' मना कर हर वर्ष की तरह लकीर खींच ली या यूँ कहे हर वर्ष की तरह ' पर्व - अदायगी ' की | महिलाओं के गुणगान हुए , देश ने महिलाओं पर कई अहसान किए | सोचना होगा - ' क्या ऐसे दिवस की हमें जरुरत है ? '
कुदरत और संस्कृति ने स्त्री को सृष्टि , समाज और संस्कार - निर्माण का विशेष दायित्व दिया है | इस दायित्व को निभाने के लिए स्त्री का दैहिक ही नहीं , मानसिक रूप से भी सक्षम होना जरुरी है | यह तो सच है कि एक स्त्री कई पीढ़ियों को शिक्षित कर लेती है |
'बेटी बचाओ - बेटी पढाओ ' नारे को कितनी महिलाएं समझ पा रही हैं ! आज भी बेटी पैदा होने पर महिला घबरा जाती है | कन्या - जन्म पर घर का माहौल ग़मगीन हो जाता है | जब वह वजूद को बचाने में सक्षम नहीं हो पाती है , तो स्त्री - नस्ल का खत्म गर्भ में ही करा देती है | इस तरह स्त्री ही स्त्री की दुश्मन हुई | ' पुत्र कामना ' की आसक्ति से ही जनसँख्या के विस्फोट में पुरुषों की तादाद बेशुमार है | हर औरत चाहती है - ' मेरी बहू बहुत दहेज़ लाए | ' ' मेरी बहू पढ़ी-लिखी आए , पर मेरे वश में रहे | ' ' मेरी बहू पोता पैदा करे | ' यही आपेक्षाएँ और धन - आसक्ति से ही हर औरत दूसरी औरत को निम्न कर रही है |
प्रायः देखा गया है - घर में बेटे - बेटी की परवरिश में ही अंतर किया जाता है | बेटे को हर तरह की स्वतंत्रता दी जाती है ,उसके स्वच्छंद और उन्मुक्त जीवन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता | माँ कह देती है - ' लड़का जात है कोई बात नहीं |' परन्तु बेटी की स्वच्छन्दता पर कुछ खामोश सवाल पनप ही जाते हैं | वार्तालाप में कभी बेटा ऊँची आवाज में बोले तो बर्दाश्त कर लिया जाता है , यदि बेटी शालीनता से भी अपनी आवाज ऊँचीं कर ले तो उसे ' तहजीब ' 'अदब ' का प्रवचन दिया जाता है | बेटी को पढ़ने की आजादी है , पर विषय चुनने का अधिकार नहीं | तात्पर्व यह कि बेटी को आजादी दी है पर बंधनों के साथ | शिक्षा भी उतनी ही कि - योग्य वर मिल जाय | बेटे के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं | हम यह नहीं सोचते कि हमारे भारत की प्रधानमन्त्री , राष्ट्रपति और कई उद्योग संचालिकाएं भी किसी घर की बेटियाँ रहीं हैं | इसका मूल कारण है -उनका शिक्षित होना | हर माँ को यह ध्यान रखना होगा कि व्यवहार और परवरिश में बेटे-बेटी में समानता बनाए रखे , जिस से दोनों सभ्यता और लिहाज का पाठ सीख सकेंगे |
जब नारी ही मानसिक - संकीर्णता से बाहर निकल कर नारी वर्ग के उत्थान में सहयोग देगी , तो पुरुष -वर्चस्व समाज भी सहयोगी होगा |
कुदरत और संस्कृति ने स्त्री को सृष्टि , समाज और संस्कार - निर्माण का विशेष दायित्व दिया है | इस दायित्व को निभाने के लिए स्त्री का दैहिक ही नहीं , मानसिक रूप से भी सक्षम होना जरुरी है | यह तो सच है कि एक स्त्री कई पीढ़ियों को शिक्षित कर लेती है |
'बेटी बचाओ - बेटी पढाओ ' नारे को कितनी महिलाएं समझ पा रही हैं ! आज भी बेटी पैदा होने पर महिला घबरा जाती है | कन्या - जन्म पर घर का माहौल ग़मगीन हो जाता है | जब वह वजूद को बचाने में सक्षम नहीं हो पाती है , तो स्त्री - नस्ल का खत्म गर्भ में ही करा देती है | इस तरह स्त्री ही स्त्री की दुश्मन हुई | ' पुत्र कामना ' की आसक्ति से ही जनसँख्या के विस्फोट में पुरुषों की तादाद बेशुमार है | हर औरत चाहती है - ' मेरी बहू बहुत दहेज़ लाए | ' ' मेरी बहू पढ़ी-लिखी आए , पर मेरे वश में रहे | ' ' मेरी बहू पोता पैदा करे | ' यही आपेक्षाएँ और धन - आसक्ति से ही हर औरत दूसरी औरत को निम्न कर रही है |
प्रायः देखा गया है - घर में बेटे - बेटी की परवरिश में ही अंतर किया जाता है | बेटे को हर तरह की स्वतंत्रता दी जाती है ,उसके स्वच्छंद और उन्मुक्त जीवन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता | माँ कह देती है - ' लड़का जात है कोई बात नहीं |' परन्तु बेटी की स्वच्छन्दता पर कुछ खामोश सवाल पनप ही जाते हैं | वार्तालाप में कभी बेटा ऊँची आवाज में बोले तो बर्दाश्त कर लिया जाता है , यदि बेटी शालीनता से भी अपनी आवाज ऊँचीं कर ले तो उसे ' तहजीब ' 'अदब ' का प्रवचन दिया जाता है | बेटी को पढ़ने की आजादी है , पर विषय चुनने का अधिकार नहीं | तात्पर्व यह कि बेटी को आजादी दी है पर बंधनों के साथ | शिक्षा भी उतनी ही कि - योग्य वर मिल जाय | बेटे के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं | हम यह नहीं सोचते कि हमारे भारत की प्रधानमन्त्री , राष्ट्रपति और कई उद्योग संचालिकाएं भी किसी घर की बेटियाँ रहीं हैं | इसका मूल कारण है -उनका शिक्षित होना | हर माँ को यह ध्यान रखना होगा कि व्यवहार और परवरिश में बेटे-बेटी में समानता बनाए रखे , जिस से दोनों सभ्यता और लिहाज का पाठ सीख सकेंगे |
जब नारी ही मानसिक - संकीर्णता से बाहर निकल कर नारी वर्ग के उत्थान में सहयोग देगी , तो पुरुष -वर्चस्व समाज भी सहयोगी होगा |
Comments
Post a Comment