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कर्म प्रधान विश्व करि रखा

कर्म प्रधान विश्व करि राखा ,
युग तो है कर्म का - यह सीखा |
लकीरों की किस्मत पर विश्वास कहाँ ?
मेहनत से लकीरों को बदल दे , विश्वास यहाँ !
चाहत से फूल झोली में नहीं गिरते ,
हाथों से डाली को हैं हम हिलाते |
आँखें मूंद नहीं सकते भाग्य - भरोसे ,
तकदीर भी तो है तदबीर के भरोसे |
सिंह भी सोते हुए निवाला नहीं पाता ,
किनारे बैठ मछुआरा मछली नहीं पाता |
मांझी ने पहाड़ को काट रास्ता बनाया ,
तदबीर से नामुमकिन को मुमकिन बनाया |
तकदीर से रार क्यों ठानी जाय ?
अँधेरे से हार क्यों मानी जाय ?
अपने हिस्से का दीया तो जलाना होगा ,
नाराज तकदीर को तदबीर से मनाना होगा |

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